लखनऊ: UP की सियासत में ठाकुर मुख्यमंत्रियों का इतिहास बहुत ज्यादा नहीं मिलता है! योगी आदित्यनाथ से पहले सिर्फ दो ठाकुर नेता ही UP के मुख्यमंत्री बन पाए, जिसमें एक राजनाथ सिंह और दूसरे VP सिंह थे. UP में पिछड़ों-दलितों की सियासत पिछले 4 दशक से हावी रही है, हालांकि योगी के आने के बाद हालात बदल गए हैं. हम आपको ठाकुर पॉलिटिक्स में ये समझाएंगे कि अखिलेश यादव को योगी के ठाकुर होने से क्या तकलीफ़ है?
योगी आदित्यनाथ के CM बनने के कुछ महीने बाद ही सपा ने आरोप लगाया कि वो एक विशेष जाति के अधिकारियों को मौका दे रहे हैं, ये भी आरोप लगाया कि थाने, चौकी से लेकर ज़िलों में तैनात अधिकारी तक ठाकुर हैं? तो सवाल है क्या सच में योगी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ कर जाति का नैरैटिव बढ़ा रहे हैं या अखिलेश यादव की कोई सियासी चाल है, जिसमें योगी को फंसाने की तैयारी है? यूपी की सियासत में पिछड़ों और दलितों का राज़ रहा! UP में बीजेपी चुनाव जीती, एक ऐसे राज्य में जहां पिछड़ों की संख्या बहुत ज्यादा है. जहां पिछड़ों के नेता मुलायम-अखिलेश हैं तो दलितों का चेहरा मायावती थीं. इन्हीं के वोट ने बीजेपी को सत्ता दिलाई और योगी को मुख्यमंत्री बनाया! UP में ठाकुर वोट सिर्फ 8 फीसदी है, लेकिन UP में कृषि की 50 फीसदी जमीन राजपूत जातियों के पास है!
अखिलेश यादव ने योगी को घेरने के लिए STF को "स्पेशल ठाकुर फोर्स" तक कहा, सुल्तानपुर में डकैती हुई, उसमें एनकाउंटर के दौरान मंगेश मारा गया तो इसे जाति से जोड़ दिया! अनुराग ठाकुर और अखिलेश यादव की संसद में एक बहस होती है? उस दौरान अनुराग ठाकुर अखिलेश यादव से जाति पूछते हैं, और अखिलेश इस बात पर नाराज़ हो जाते हैं, कहते हैं आपकी हिम्मत कैसे हुई हमारी जाति पूछने की? तो अब UP में आगे क्या होगा? दरअसल दिक्कत योगी की जाति से नहीं है, असली समस्या ये है कि अखिलेश यादव अब खुद यादवों के नेता हैं या नहीं, इस बात का डर सता रहा है? उनके पिता मुलायम सिंह यादव भी एक वक्त में ठाकुरों को निशाने पर रखते थे! साल 1994 में मुलायम सिंह यादव ने फूलन देवी को बिना मुकदमा चलाए ही जेल से रिहा करने के आदेश सुनाया! फूलन पर उन दिनों 22 ठाकुरों की हत्या का आरोप लगा था. इस एक निर्णय से ठाकुर समाज मुलायम सिंह यादव का विरोधी हो गया! जबकि फूलन की रिहाई के बाद दलितों में मुलायम का क्रेज़ बढ़ गया! हालांकि ये खाई जो वहां पैदा हुई वो अखिलेश यादव की सरकार में और बढ़ गई!
साल 2012 में जब अखिलेश UP के मुख्यमंत्री बने तो उनकी कैबिनट में कुल 11 ठाकुर नेताओं को मंत्री बनाया गया! जिसमें एक नाम राजा भैया का भी था. हालांकि उनको सत्ता में आते ही ये समझ आ गया कि ठाकुरों को OUT करना होगा और पिछड़ों और दलितों की राजनीति करनी होगी! एक समय में जिनके 11 मंत्री ठाकुर थे आज वही यूपी के सीएम की जाति पर सवाल कैसे उठा सकते हैं? जबकि योगी आदित्यनाथ की सरकार में सिर्फ 7 ठाकुर मंत्री हैं, खुद योगी को मिलाकर संख्या 8 होती है...यानि योगी से ज्यादा ठाकुर नेताओं को अखिलेश ने मंत्रालय दिया था! तो फिर अब अखिलेश यादव को ठाकुर जाति से दिक्कत क्यों हो गई? ये दिक्कत साल 2012 से 2017 तक नहीं थी? यहां तक कि उनकी पत्नी डिंपल यादव भी ठाकुर जाति की ही लड़की हैं, उनके छोटे भाई की बहन अपर्णा भी ठाकुर जाति से ही आती हैं, शिवपाल यादव के बेटे की पत्नी भी ठाकुर जाति से ही आती हैं. फिर अखिलेश यादव ठाकुर जाति के ख़िलाफ़ प्रचार कैसे कर रहे हैं? इनके पिता के बेहद ख़ास अमर सिंह भी पार्टी में थे. लेकिन आज योगी के ठाकुर होने से दिक्कत क्यों है?
आज हालात ये हो गए कि राजस्थान से लेकर यूपी तक के ठाकुर एक साथ अखिलेश यादव का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि जब तक बात योगी पर थी, सब चुप थे. पर अब बात राणा सांगा तक पहुंच गई. यहां सवाल ये उठता है कि सपा को ठाकुरों का वोट क्यों नहीं चाहिए, क्योंकि UP में ठाकुर वोट सिर्फ 8 फीसदी है, जबकि OBC यानि पिछड़े समाज की हिस्सेदारी 40 फीसदी है, दलित वोटरों की हिस्सेदारी 21 फीसदी है, यानि 40 फीसदी OBC+21 फीसदी दलित+20 फीसदी मुसलमान= 81 फीसदी होते हैं! अब अखिलेश यादव इसिलिए ठाकुर-ठाकुर का रट लगाएं बैठे हैं क्योंकि उनके PDA में 81 फीसदी वोट बैंक है! इसलिए राणा सांगा पर बयान दिलवाया, ताकि ठाकुर जाति के लोग विरोध करें और दलितों-पिछड़ों में अगड़ों के ख़िलाफ़ विरोध पैदा किया जा सके. लेकिन अखिलेश यादव की एक समस्या ये है कि OBC वोटरों के साथ दलित और मुसलमानों के वोटबैंक में बीजेपी ने सेंध लगा दी है?
योगी के फैन तो अखिलेश यादव के घर में ही मौजूद हैं! यादव वोटबैंक का सपा से कम होना, विरासत की सियासत के लिए ख़तरनाक है! यादवों को राष्ट्रवादी कहा जाता है. यादव समाज अखिलेश का हर हाल में साथ दे सकता है, लेकिन कभी राष्ट्रविरोधी सोच के साथ शामिल नहीं हो सकता! लोकसभा चुनाव में यादवों के नाम पर सियासत करने वाली पार्टी ने जिन यादवों को टिकट दिया वो सब मुलायम फैमिली से ही आते हैं. जबकि पार्टी में मुसलमानों का बढ़ता दबाव भी यादवों को पसंद नहीं आ रहा है! पीएम मोदी का मोहन यादव को CM बनाना, UP की सियासत में यादव नेताओं का बीजेपी में एंट्री लेना, खुद यादव परिवार की बहू अपर्णा यादव का बीजेपी में आना, शिवपाल यादव की स्थिति स्पष्ट न होना साफ इशारा करता है कि अखिलेश यादव का काम अब सिर्फ यादव वोटर से नहीं हो पाएगा, अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनना है तो मायावती के वोटरों का साधना होगा, इसलिए पिछले कुछ दिन से वो डॉक्टर अंबेडकर की रट लगा बैठे हैं.
मुसलमानों का वोट चाहिए, इसलिए वो वक्फ़ बोर्ड कानून के ख़िलाफ़ हैं, संभल में हिन्दुओं के नहीं बल्कि पत्थरबाज़ों के साथ हैं! तो भाई सवाल ये उठता है कि अगर अखिलेश को मुख्यमंत्री ही बनना है तो वो योगी की जाति पर टारगेट क्यों कर रहे हैं? तो हम इस बात को भी समझाते हैं! योगी पहले ठाकुर हैं या संत ये तो जनता को तय करना है, लेकिन योगी ने संत के रूप में हिन्दुओं को जब से एक करने का नारा दिया है, उससे सपा की बेचैनी बढ़ गई है.हिन्दुओं को एक करके योगी ने अयोध्या चुनाव जीता कर दिखा दिया! उनके नारे ने महाराष्ट्र, हरियाणा जैसे राज्यों के नतीजे बदल डाले? अगर हिन्दू एक हो जाएगा तो जाति व्यवस्था वाली यूपी की सियासत पर बुलडोज़र चल जाएगा? इसलिए अखिलेश योगी को ठाकुर कहकर पिछड़ी जातियों और अगड़ी जातियों में दूरी बांटने का प्रयास कर रहे हैं, नतीजा राणा सांगा पर मज़बूरी में ही योगी को ख़ामोश रहना पड़ा, क्योंकि अगर वो कोई भी कार्रवाई करते तो अखिलेश यादव उस कार्रवाई को दलितों के बीच गलत नैरेटिव के साथ पेश करते, जिससे भविष्य में बीजेपी को नुकसान हो जाता, और 2027 का चुनाव योगी हार सकते थे.
सपा ने जिस जाति व्यवस्था में चिंगारी लगाई थी, उस पर योगी ने बेशक पानी डाल दिया हो पर वो कुछ भी भूलते नहीं है. 2027 चुनाव के बाद सपा सांसद पर कोई ठोस कार्रवाई हो सकती है! इसका जिक्र उन्होंने अमर उजाला के कार्यक्रम के दौरान भी किया कि सपा जातियों में आग लगाना चाहती है. अब सवाल ये उठता है दोस्तों कि इस पूरी कहानी से आप क्या समझे, जब योगी हिंदुओं को एक करना चाहते हैं तो अखिलेश हिंदुओं को जातियों में क्यों बांटना चाहते हैं. दुनिया में जितने भी धर्म हैं, उनकी जाति व्यवस्था पर बात नहीं की जाती, तो अखिलेश हिंदुओं की जाति व्यवस्था पर जातिगत जनगणना का प्रस्ताव क्यों रखते हैं. क्या उन्हें इस बात का डर है कि अगर हिंदू एक हो गया तो जातियों के नाम पर चल रही कई राजनीतिक पार्टियों का वर्तमान इतिहास में बदल जाएगा.