कानपुर : उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर प्रशासन ने राजस्व अभिलेखों में हेरफेर और संदिग्ध जमीन सौदों के आरोप में घिरे कानूनगो को लेकर बड़ा खुलासा किया है. जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने जांच रिपोर्ट आने के बाद कानूनगो आलोक दुबे को डिमोशन करते हुए फिर से लेखपाल बना दिया है. साथ ही उनकी सेवा पुस्तिका में परिनिन्दा प्रविष्टि दर्ज की गई है.
पूरे प्रकरण का खुलासा तब हुआ जब अधिवक्ता संदीप सिंह चंदेल ने 2 दिसंबर 2024 को जिलाधिकारी को लिखित शिकायत की थी. आरोप था कि सिंहपुर कछार इलाके की करीब चार बीघा जमीन को फर्जी कागजों के सहारे बेच दिया गया. इस आरोपों के बाद डीएम ने एडीएम न्यायिक, एसडीएम सदर और एसीपी कोतवाली की तीन सदस्यीय जांच समिति बनाकर जांच कराई.
समिति की रिपोर्ट में पाया गया कि कानूनगो रहे आलोक दुबे ने पीड़ित अधिवक्ता के परिजनों की विवादित भूमि पर एक ही दिन में वरासत दर्ज कराकर उसी दिन बैनामा भी करा लिया. इतना ही नहीं कुछ माह के भीतर उस जमीन को निजी कंपनी आरएनजी इंफ्रा नाम की कंपनी को बेच भी दिया. उस संपत्ति का बाजार मूल्य लगभग चार करोड़ रुपये है.
सहायक महानिरीक्षक निबंधन की रिपोर्ट में आलोक दुबे और उनके परिजनों के नाम पर कुल 41 संपत्तियां रजिस्ट्री मिली. इनकी अनुमानित कीमत 30 करोड़ रुपये बताई गई है, इनमें 8.62 हेक्टेयर जमीन दुबे व क्षेत्रीय लेखपाल अरुणा द्विवेदी के नाम दर्ज है. जांच में सामने आया कि इन सौदों में सक्षम प्राधिकारी की कोई अनुमति नहीं ली गई थी और न ही इन्हें मानव संपदा पोर्टल पर ही दर्ज किया गया. जब आरोप प्रमाणित हुए तो 17 फरवरी को आलोक दुबे को निलंबित किया गया. पीड़ित अधिवक्ता ने 7 मार्च को कोतवाली में आलोक समेत सात लोगों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया.
दयानंद विहार निवासी आलोक दुबे 1993 में लेखपाल के पद पर नियुक्त हुए थे. पहली नियुक्ति इटावा में हुई थी, जिसके बाद 1995 में वह कानपुर आ गए और तब से लगातार सदर तहसील में जमे रहे. कई बार उनका तबादला भी हुआ, मगर अधिकारियों से सांठ-गांठ कर संबद्धीकरण करवाकर वह वापस सदर तहसील वापस आ जाते थे.
आलोक दुबे साल 2022 से 2025 तक वे तहसील लेखपाल संघ के अध्यक्ष भी रहे. 2023 में कानूनगो पद पर प्रमोशन पाकर उन्हें नर्वल तहसील भेजा गया, लेकिन एसडीएम और अफसरों की मदद से फिर सदर तहसील में लौट आए. अब जब जांच के बाद कार्रवाई हुई और उन्हें लेखपाल के पद पर पदावनत किया गया तो माना जा रहा है कि यह स्थिति कहीं न कहीं उनकी खुद की इच्छा के अनुरूप भी रही.