नई दिल्ली: अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की नई रिपोर्ट भारत में कामकाज की स्थिति 2026 (State of Working India 2026) में भारत के युवाओं की शिक्षा और रोजगार की स्थिति पर गहन विश्लेषण किया गया है. रिपोर्ट बताती है कि पिछले चार दशकों में भारत ने युवाओं (15-29 वर्ष) के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने में बड़ी सफलता हासिल की है. युवाओं में ग्रेजुएट्स की संख्या तेजी से बढ़ी है. 2004 में जहां युवाओं में सिर्फ 10% ग्रेजुएट थे (लगभग 1.9 करोड़), वहीं 2023 में यह बढ़कर 28% हो गई (लगभग 6.3 करोड़). हर साल औसतन 50 लाख नए ग्रेजुएट्स जुड़ रहे हैं.
लेकिन समस्या यह है कि नौकरियां इस गति से नहीं बढ़ रही हैं. परिणामस्वरूप, बेरोजगारी की स्थिति गंभीर हो गई है, खासकर शिक्षित युवाओं में. रिपोर्ट के अनुसार, 20-29 वर्ष के बेरोजगार युवाओं में ग्रेजुएट्स का हिस्सा 2004 के 32% से बढ़कर 2023 में 67% हो गया है. यानी बेरोजगार युवाओं में से दो-तिहाई से ज्यादा डिग्रीधारी हैं (लगभग 1.1 करोड़ ग्रेजुएट बेरोजगार).
कुल मिलाकर, 15-29 वर्ष के ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी दर बहुत ऊंची बनी हुई है. 15-25 वर्ष वालों में लगभग 40% और 25-29 वर्ष वालों में 20%.
यह समस्या नई नहीं है; 1983 से 2023 तक ग्रेजुएट बेरोजगारी 35-40% के बीच ही रही है, भले ही ग्रेजुएट्स की संख्या कई गुना बढ़ गई हो.
रोजगार की गुणवत्ता भी चिंताजनक
उच्च शिक्षा में आर्थिक बाधाएं अभी भी बनी हुई हैं, खासकर इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे महंगे कोर्स में. गरीब परिवारों के लिए ये डिग्रियां अक्सर पहुंच से बाहर होती हैं. 2017 के बाद युवा पुरुषों की शिक्षा में हिस्सेदारी थोड़ी घटी है (38% से 34%), क्योंकि कई घरों में वे परिवार की आय बढ़ाने के लिए जल्दी काम पर लग जाते हैं. कुल मिलाकर, भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड (युवा आबादी का लाभ) आर्थिक लाभ में तब्दील हो पाएगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि शिक्षित युवाओं को कितनी अच्छी नौकरियां मिल पाती हैं.
2030 के बाद कामकाजी उम्र की आबादी का अनुपात घटने लगेगा, इसलिए रोजगार सृजन की गति अब और तेज करनी होगी. यह रिपोर्ट सरकारी डेटा (PLFS, NSS), CMIE सर्वे और अन्य स्रोतों पर आधारित है. कुल मिलाकर, शिक्षा का विस्तार तो हुआ है, लेकिन रोजगार सृजन और स्किल-जॉब मैचिंग में बड़ी कमी बनी हुई है, जिससे लाखों शिक्षित युवा बेरोजगार या कम गुणवत्ता वाली नौकरियों में फंसे हैं.