नई दिल्ली: ये किस्सा बिहार के उस दौर का है, जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठी थीं राबड़ी देवी, चारा घोटाले में लालू जेल से अंदर-बाहर हो रहे थे और तेजस्वी-तेजप्रताप तब सियासत में नहीं आए थे. पूरे बिहार में राबड़ी के भाई साधू यादव का सिक्का चलता था, साधू से दोस्ती करने वालों की उन दिनों लाइन लगती थी, जिनमें से एक थे 27 साल के गौतम सिंह, जिनका पिता बीएन सिंह और पूरा परिवार विदेश में रहता था, लेकिन गौतम को सियासत में आना था, इसलिए वो साधू से करीबियां बढ़ा रहे थे, लेकिन इस वो सपना पूरा हो पाता उससे पहले ही एक नए कैरेक्टर की एंट्री हो जाती है. और वो कैरेक्टर है शिल्पी जैन, जो गौतम से बेइंतहा मोहब्बत करती थी. पर जुलाई का महीना इसके लिए काल बनकर आता है.
तारीख थी 3 जुलाई 1999, जगह- बिहार की राजधानी पटना... वुमेंस कॉलेज से पढ़ी 23 साल की एक लड़की जिसका नाम शिल्पी था, कोचिंग इंस्टीट्यूट के लिए घर से निकलती है, पिता पटना के बड़े कपड़ा कारोबारी थे, लेकिन शिल्पी रिक्शा से ही कोचिंग जाती थी, रास्ते में उसे एक लड़का मिलता है, जो गौतम सिंह का दोस्त था, वो कहता है मैं आपको छोड़ देता हूं, शिल्पी भी उस लड़के को जानती थी, इसलिए कार में बैठ जाती है, पर कार कोचिंग की बजाय एक गेस्ट हाउस पर पहुंच जाती है, शिल्पी सवाल पूछती है तो वो लड़का कहता है गौतम भी यहीं है, वहां से पहले मौजूद कुछ लोग शिल्पी के साथ जबरदस्ती करते हैं, ये बात जैसे ही गौतम को किसी तरह पता चलती है, वो तुरंत भागकर वहां पहुंचता है. उन दिनों ये गेस्ट हाउस अय्याशी का अड्डा बना हुआ था ये बात गौतम भी बेहतर तरीके से जानता था.
लोग बताते हैं...गौतम वहां पहुंचते ही देखता है शिल्पी के शरीर पर कोई कपड़े नहीं है, वो रो रही है, चारों तरफ से लोगों ने उसे घेर रखा है, वो बचाने की कोशिश करता है, तो उसे भी हाथ, पैर और जूतों से पीटा जाता है.
इधर शिल्पी और गौतम ये समझ नहीं पा रहे थे कि उन्हें किस बात की सजा दी जा रही है, उधर शिल्पी के पिता पुलिस के पास पहुंचते हैं, बिटिया 8 घंटे तक घर नहीं पहुंची तो मुकदमा लिखवाते हैं, पुलिस जांच में जुटती है और रात करीब 8.30 बजे साधू यादव के क्वार्टर वाले गैराज से गौतम की सफेद कार बरामद करती है, जिसमें दोनों की बॉडी मिलती है, शिल्पी के बदन पर गौतम की टीशर्ट थी, जबकि गौतम ने सिर्फ जींस पहन रखा था, तुरंत साधू यादव समर्थकों के साथ मौके पर पहुंचते हैं, पुलिस इतनी दबाव में आ जाती है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले ही एक अधिकारी कहते हैं... ये खुदकुशी का मामला है, हमने इतने केस देखे हैं कि पहले ही बता देते हैं, क्या हो सकता है? पुलिस खुद गाड़ी चलाकर थाने ले जाती है, जिससे फिंगरप्रिंट मिट जाते हैं, पर पुलिस की लीपापोती से लोगों का गुस्सा बढ़ जाता है, और सीबीआई जांच की मांग उठने लगती है.
सितंबर 1999 में यानि तीन महीने बाद ही राबड़ी देवी को ये केस सीबीआई को ट्रांसफर करना पड़ता है, सीबीआई के अधिकारी डीएनए जांच के लिए साधू यादव से संपर्क करते हैं, कहते हैं आपका सैंपल लेना है, पर साधू यादव न सिर्फ इनकार करते हैं, बल्कि सीबीआई वालों को भगा देते हैं, जिसके बाद अधिकारियों की दोबारा हिम्मत नहीं होती कि वो अदालत से जाकर कोई आदेश लेकर आएं, ये साधू यादव का रसूख था, नतीजा सीबीआई करीब चार साल तक इस केस की जांच करती है, लेकिन होता वही है जो सुशांत सिंह राजपूत के केस में हुआ.
सीबीआई अपनी क्लोजर रिपोर्ट में भी वही बात लिखती है, जो बिहार पुलिस ने बगैर जांच के बता दिया था, आज भी इस कपल की आत्मा इंसाफ मांग रही है, साल 2004 में सीबीआई ये फाइल बंद कर देती है, साल 2005 में सरकार बदलती है, पर सबूतों के अभाव में कोई कार्रवाई नहीं हो पाती, ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि बिहार में जंगलराज की स्थिति क्या थी, और बिहार उस दौर से कैसे निकला है. पूरी घटना सुनने के बाद आप क्या कहना चाहेंगे, कमेंट कर अपनी राय जरूर दें.