संदीप शर्मा
2024 चुनाव में बीजेपी को नुकसान क्षेत्रीय पार्टियों ने करवाया, चाहे वो आरजेडी हो या सपा, क्या उसका बदला अब दूसरी पार्टियों से लिया जा रहा है और इसका असर क्या उत्तर प्रदेश में भी पड़ने वाला है, यहां बीजेपी की सहयोगी पार्टियों के नेताओं की धड़कनें क्यों बढ़ी हुई है, अगर इसे समझना है तो बीते 48 घंटे में देश के दो राज्यों में हुए सियासी उलटफेऱ को समझना होगा. सबसे पहले इसकी शुरुआत होती है हरियाणा से, 24 घंटे में ही जेजेपी के 4 विधायक पार्टी छोड़ देते हैं. ईश्वर सिंह, देवेंद्र बबली, अनूप धानक और राम करण कला के बीजेपी में शामिल होने की ख़बरें सामने आती है.
उसके अगले ही दिन झारखंड की सियासत से दिमाग हिला देने वाली ख़बर सामने आती है, जिस चंपई सोरेन को सबसे मुश्किल वक्त में हेमंत सोरेन ने सीएम बनाया था, जेल जाने के दौरान अपनी पत्नी से भी ज्यादा भरोसा जताया था, वो चंपई सोरेन अचानक से पार्टी छोड़कर दिल्ली पहुंच जाते हैं. झारखंड के टाइगर कहे जाने वाले चंपई के बीजेपी में शामिल होने की ख़बरें सामने आने लगती है, जिसके बाद से हेमंत सोरेन सबसे ज्यादा टेंशन में हैं, क्योंकि चंपई सोरेन वो नेता हैं, जो जेएमएम के स्थापना के दिनों से पार्टी से जुड़े हैं, उनके एक इशारे पर जेएमएम में कितनी बड़ी टूट हो सकती है.
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ये हेमंत सोरेन भले ही न समझ पाएं लेकिन उनके पिता शिबू सोरेन इस बात को अच्छी तरह समझते हैं, क्योंकि चंपई और शिबू सोरेन की दोस्ती पुरानी है. चंपई सोरेन झारखंड की सियासत के वो नेता हैं, जो सोरेन परिवार से न होने के बावजूद सोरेन परिवार के बेहद करीब हैं. ऐसे में बाद सवाल ये उठते हैं कि क्या जिन-जिन राज्यों में चुनाव है, वहां-वहां की क्षेत्रीय पार्टियों का हाल बुरा होने वाला है. क्या जो पार्टी बीजेपी को आंख दिखाएगी, उसकी सियासी कब्र खुद जाएगी, क्योंकि कुछ राज्यों के उदाहरण तो यही कहते हैं.
पर उत्तर प्रदेश में कहानी कुछ इधर-उधऱ होती नजर आ रही है, जबसे योगी आदित्यनाथ को कुर्सी से हटाए जाने की ख़बरें मीडिया में चलनी शुरू हुई, सहयोगी दलों के कई नेताओं ने अलग-अलग बयान देना शुरू कर दिया था, जिसमें अनुप्रिया पटेल से लेकर संजय निषाद तक थे और ओपी राजभर तो योगी के पुराने विरोधी हैं, जिन्हें सरकार में सिर्फ इस वजह से साथ लाया गया ताकि चुनाव में राजभर वोटबैंक पर अच्छी पकड़ बन सके. ऐसे में सहयोगी पार्टियों को भी ये चिंता सताने लगी है कि हमारी पार्टी चाहे कितनी भी सीटें जीत ले, अगर विधायक अपने कंट्रोल में नहीं रहे, तो सियासी रूप से हम कमजोर पड़ जाएंगे.
ये तो आप भी जानते होंगे कि जिस पार्टी के पास जितने ज्यादा सांसद और विधायक होते हैं, उसका रुतबा उतना ही बड़ा होता है, वो अलग बात है कि शुरुआती दो कार्यकाल में मोदी सरकार पर सहयोगी पार्टियों पर ध्यान न देने के आरोप लगे पर अब चूंकि गठबंधन की सरकार है, इसलिए केन्द्र सरकार पर सहयोगी पार्टियों का कहीं न कहीं दबाव जरूर है, और ये दबाव तभी कम होगा जब पार्टी बहुमत के आंकड़े तक अकेले पहुंच जाए, और ये चुनाव के बाद सिर्फ जोड़-तोड़ की राजनीति से ही संभव हो सकता है, तो क्या बड़े विपक्षी नेता जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप खुद बीजेपी के नेता लगाते थे, उन्हें पार्टी में लाने के पीछे की प्लानिंग यही है, या झारखंड से लेकर हरियाणा तक विधानसभा चुनाव जीतने के लिए सारी प्लानिंग बनाई जा रही है.