मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक गंभीर मामले में सौतेले पिता को बड़ा झटका दिया है. कोर्ट ने नाबालिग सौतेली बेटी के साथ बलात्कार के आरोपी की जमानत रद्द कर दी और उसे तुरंत गिरफ्तार करने का आदेश दिया. अदालत ने साफ कहा कि पत्नी का पति से अलग होना सामान्य वैवाहिक झगड़ा नहीं माना जा सकता, खासकर जब उसने पति पर अपनी नाबालिग बेटी के यौन शोषण का आरोप लगाया हो.
यह मामला ठाणे का है, जहां एक 47 वर्षीय व्यक्ति पर अपनी सौतेली बेटी (उम्र 16 साल) के साथ अप्रैल 2023 से 2025 तक पांच बार बलात्कार करने का आरोप है. पीड़िता की मां ने 2014 में आरोपी से दूसरी शादी की थी. अप्रैल 2025 में छठी बार कोशिश के बाद लड़की ने हिम्मत जुटाकर मां को सब कुछ बताया. मां ने तुरंत बेटी को लेकर मायके चली गई और पुलिस में केस दर्ज कराया.
ट्रायल कोर्ट ने जून 2025 में आरोपी को जमानत दे दी थी. अदालत ने मुख्य रूप से यह मान लिया था कि पति-पत्नी में विवाद चल रहा है, इसलिए पत्नी ने झूठा मामला दर्ज कराया है. साथ ही शिकायत में देरी को भी संदिग्ध बताया गया.
हाईकोर्ट की जस्टिस नीला गोखले की बेंच ने इस फैसले को गलत ठहराया. कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मामले को सतही तरीके से देखा और एफआईआर की गंभीरता को नजरअंदाज किया. अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर किसी मां को पता चलता है कि उसका पति उसकी नाबालिग बेटी का शोषण कर रहा है, तो उसका अलग होना पूरी तरह स्वाभाविक है. इसे वैवाहिक विवाद कहकर खारिज नहीं किया जा सकता.
शिकायत में देरी के बारे में हाईकोर्ट ने कहा कि यौन शोषण के मामलों में पीड़ित बच्चे अक्सर डर, शर्म या दबाव की वजह से तुरंत बोल नहीं पाते. यहां लड़की ने कई बार चुपचाप सहन किया और जब ज्यादा नहीं सहा गया, तब मां को बताया. इसलिए देरी यहां सामान्य है और इसे झूठ का आधार नहीं माना जा सकता.
पीड़िता ने अपनी मां के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिसमें जमानत रद्द करने की मांग की गई. राज्य सरकार ने भी पीड़िता का पक्ष लिया. कोर्ट ने अपराध की घृणित प्रकृति को देखते हुए कहा कि आरोपी को बाहर छोड़ना ट्रायल को प्रभावित कर सकता है और पीड़िता परिवार पर दबाव बन सकता है.
इसके अलावा, सुनवाई के दौरान आरोपी या उसके वकील कोर्ट में हाजिर नहीं हुए, जो उनके खिलाफ गया. अंत में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को कानून की गलत समझ पर आधारित बताते हुए रद्द कर दिया और आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी का निर्देश दिया.
इस फैसले से कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों को कभी वैवाहिक विवादों की आड़ में हल्के में नहीं लिया जा सकता.