Chirag Paswan election plan: चिराग पासवान एक तरफ तो कहते हैं मैं मोदी का हनुमान हूं, तो दूसरी तरफ नीतीश की नींद उड़ाने वाला ऐलान करते हैं, सारण की धरती से 6 जुलाई को वो कहते हैं मैं चुनाव लड़ूंगा और मेरी पार्टी बिहार की 243 सीटों पर उतरेगी. जिसके बाद सवाल ये उठ रहे हैं कि चिराग की पार्टी लोजपा (आर) तो एनडीए गठबंधन में है, और गठबंधन का नियम ये कहता है जितनी सीटें मिली उतने पर चुनाव लड़ो, बाकी पर सहयोगी पार्टियों का समर्थन करो, तो क्या चिराग ने खुद को गठबंधन से बाहर कर लिया है, ऐसा कोई ऐलान उन्होंने अब तक किया नहीं है, और ना ही आगे करेंगे, बल्कि उनके इस ऐलान के मायने कुछ और हैं. चिराग के इस ऐलान से बिहार बीजेपी और जेडीयू के कार्यकर्ताओं में भी कंफ्यूजन है, वो भी कुछ कहने को तैयार नहीं हैं, ना ही दिल्ली से कोई आदेश निकला है. तो आखिर ये माजरा क्या है, इसे समझने के लिए साल 2020 के चुनाव को देखना होगा.
अक्टूबर 2020 में चिराग पासवान के पिता रामविलास पासवान का निधन होता है, पार्टी को लेकर अंदरखाने लड़ाई शुरू हो जाती है. रामविलास के भाई पशुपति पारस पार्टी पर दावा ठोंकते हैं, चिराग अलग दावा ठोंकते हैं, उसी साल विधानसभा चुनाव भी थे तो एनडीए से सीट बंटवारे में सहमति नहीं बनी और चिराग ने 134 सीटों पऱ अपने उम्मीदवार उतार दिए, कई राजनीतिक पंडित कहते हैं चिराग के ऐसा करने से नीतीश की पार्टी की सीटें कम हुई, हालांकि नीतीश फिर भी सीएम बने. जिसका सीधा सा मतलब ये हो सकता है कि चिराग ये सारे ऐलान सीट बढ़वाने को लेकर कर रहे हों.
“चिराग के पास 5 सांसद हैं, और 25-30 सीटें वो गठबंधन में चाहते हैं, लेकिन साथ में उनकी नजर जेडीयू वाली सीट पर है. जहां 2020 के चुनाव में उनकी पार्टी के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे और जेडीयू कैंडिडेट की जीत हुई थी, ऐसी करीब 14 सीटें बिहार में हैं.”
अब जेडीयू अपनी जीती हुई सीटें छोड़ना चाहती नहीं, तो फिर सहमति बनेगी कैसे, इसे लेकर बिहार की सियासत में अलग तरीके की हलचल चल रही है. क्योंकि बीते कुछ सालों से चिराग की ही चल रही है, पहले उन्होंने अपने चाचा पशुपति पारस जो केन्द्र में मंत्री हुआ करते थे, उन्हें एनडीए छोड़ने पर मजबूर किया, और अब बिहारी फर्स्ट का नारा भी दे रहे हैं. और अब छपरा की धरती से बड़ा ऐलान करते हैं तो उसके मायने कई हैं.
उसी सभा से चिराग कहते हैं चुनाव लड़ूंगा, जिसे कार्यकर्ताओं में कंफ्यूजन की स्थिति पैदा हो गई है. अब चिराग आगे क्या करेंगे, कोई नहीं जानता, लेकिन राजनीतिक पंडित कहते हैं चिराग का सारा पैंतरा सीटें बढ़वाने को लेकर है, तो क्या सीटें कम मिली तो चिराग सभी सीटों पर अकेले लड़ेंगे, ये बड़ा सवाल है. सियासत में कब क्या हो जाए, कहना मुश्किल है, अगर चिराग लड़ेंगे तो उनके सामने उनके चाचा पशुपति पारस भी हो सकते हैं, औऱ फिर चाचा भतीजे की लड़ाई में कौन बाजी मारता है, इस पर पूरे बिहार की निगाहें टिकी होंगी. एक मतदाता के तौर पर आप चिराग को क्या सलाह देना चाहेंगे.