नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली का सबसे व्यस्त और प्रमुख कारोबारी केंद्र कनॉट प्लेस शुक्रवार शाम एक ऐसे प्रदर्शन का गवाह बना, जहां भारी भीड़ तो जुटी लेकिन न तो कोई अगुवा दिखा और न ही कोई तय रणनीति। कॉक्रोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और केंद्र सरकार के विरोध में बुलाए गए इस प्रदर्शन की तस्वीरें देखकर लोग हैरान हैं। छात्रों, वामपंथी संगठनों और आम नागरिकों की मौजूदगी के बावजूद जमीनी स्तर पर यह समझना मुश्किल हो गया कि यह एक गंभीर आंदोलन था या केवल बिना सिर-पैर का ड्रामा।
शाम ढलते ही बढ़ी भीड़, लेकिन नदारद रहा नेतृत्व
शाम करीब चार बजे कनॉट प्लेस के अलग-अलग कोनों में 5 से 10 लोगों की छोटी-छोटी टोलियां नजर आने लगीं। 5 बजे तक इन समूहों ने इनर सर्कल का रुख किया और भीड़ देखते ही देखते हजार के पार पहुंच गई। दूसरी ओर, संभावित टकराव की आशंका को देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात था।
हैरानी की बात यह रही कि इतनी बड़ी संख्या में जुटने के बावजूद आंदोलनकारियों के पास न तो कोई तय मंच था और न ही कोई मार्ग। बातचीत में कई लोगों ने स्वीकार किया कि वे सिर्फ यह देखने आए थे कि सीपी में क्या हो रहा है, जबकि कुछ युवाओं ने कहा कि वे यहां के पब और क्लबों में वीकेंड मनाने आए थे और उत्सुकतावश भीड़ का हिस्सा बन गए।
प्रमुख चेहरों के न रहने से बिखरी रणनीति
दरअसल, CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने इस 'तिरंगा मार्च' की घोषणा की थी, लेकिन प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही दिल्ली पुलिस ने नोटिस का हवाला देकर उन्हें हिरासत में ले लिया। वहीं, संगठन के दो अन्य चेहरे आशुतोष रांका और सौरव दास पहले से हिरासत में थे।
शीर्ष चेहरों के हटने के बाद संगठन की ओर से कोई दूसरी कतार का नेता आगे नहीं आया। दो घंटे से ज्यादा समय बीतने के बाद भी कोई मार्गदर्शन देने वाला मौजूद नहीं था। नतीजा यह हुआ कि भीड़ किसी संगठित मार्च की जगह अलग-अलग दिशाओं में बिना तालमेल के भटकती नजर आई।
टुकड़ों में नारे, असमंजस में प्रदर्शनकारी
.शाम 5:25 बजे पालिका बाजार के गेट नंबर-1 से करीब 100 लोगों का जत्था तिरंगा लेकर इनर सर्कल की ओर निकला। इसी दौरान टॉल्स्टॉय मार्ग पर एसएफआई (SFI) के छात्र जुटे, जबकि आईसा (AISA) नेता नेहा बोरा को पहले ही मंडी हाउस से रोक लिया गया था। शाम 7:30 बजे माकपा (CPI-M) सांसद जॉन ब्रिटास ही एकमात्र प्रमुख राजनीतिक चेहरा रहे जो मौके पर पहुंचे।
प्रदर्शन के दौरान तालमेल का अभाव इस कदर दिखा कि खुद आंदोलनकारी एक-दूसरे से पूछते दिखे कि आगे कहां जाना है। एक रिटायर्ड प्रोफेसर पत्रकारों से ही पूछ बैठीं कि मुख्य भीड़ कहां है, वहीं डीयू की एक छात्रा कभी पालिका बाजार, कभी जंतर-मंतर तो कभी इनर सर्कल के चक्कर काटती नजर आई। रात 8 बजे तक पुलिस ने दर्जनों लोगों को हिरासत में ले लिया, जिसके बाद बिखरा हुआ यह मजमा धीरे-धीरे सिमट गया।