...जो हाल आपके गांव के अस्पताल का है, वही बड़े शहरों के अस्पताल का भी होने वाला है. साल 2035 तक हिंदुस्तान के हेल्थकेयर सिस्टम पर बड़ा खतरा मंडराने जा रहा है, और आप सावधान होकर भी कुछ नहीं कर पाएंगे, क्योंकि आपकी और आपके परिवार की जान बचाने वाला डॉक्टर ही माइनस 40 डिग्री नंबर लाकर स्पेशलिस्ट बनकर बैठा होगा... जिसने MBBS की पढ़ाई तो की होगी, पर उसके बाद स्पेशलिस्ट बनने के लिए जो परीक्षा होती है, NEET PG की.... उसमें माइनस 40 नंबर लाकर भी पास हो गया होगा... क्योंकि ये फैसला स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय की मंजूरी के बाद नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइसेंज ने लिया है...और हर वर्ग के लिए कटऑफ घटा दिया है.
ये परीक्षा निगेटिव मार्किंग वाली होती है, इसलिए -40 का आंकड़ा रखा गया है...सरकार का तर्क है पहले भी नीट पीजी की सीटें भरने के लिए वो ऐसी तरकीब अपना चुकी है, पर क्या क्वांटिटी के चक्कर में ऐसे क्वालिटी नहीं घट रही है... क्या माइनस 40 नंबर लाने वाला डॉक्टर बेहतर स्पेशलिस्ट बन पाएगा, अगर हां तो फिर पूरा सोशल मीडिया एक सुर में सवाल पूछ रहा है क्या ये डॉक्टर सही इलाज कर पाएंगे...
आनंद रंगनाथन X पोस्ट कर पूछते हैं कि क्या ऐसा कोई बिल भी लाया जाएगा कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सीजेआई, और मंत्री माइनस 40 नंबर लाने वाले डॉक्टर से अपना इलाज करवाएंगे. जब भी कोई नेता बीमार पड़ता है तो आज भी वो सरकारी की बजाय ज्यादातर प्राइवेट अस्पताल में क्यों जाता है, कांग्रेस की चेयरपर्सन सोनिया गांधी का इलाज सर गंगाराम अस्पताल से चलता है. यूपी में मंत्री ओपी राजभर जब बीमार पड़ते हैं, तो उन्हें यूपी के स्वास्थ्य मंत्री खुद ले जाकर प्राइवेट अस्पताल में भर्ती करवाते हैं, तो फिर सरकारी अस्पतालों की तथाकथित सुविधाएं क्या सिर्फ वोट लेने के लिए है... जरा सोचिए... अगर सरकार के इस फैसले पर आपने अपनी राय नहीं रखी तो समझिए आने वाले भविष्य में हिंदुस्तान के हेल्थकेयर सिस्टम पर जब सवाल उठेंगे, तो आपको उस वक्त सवाल पूछने का कोई हक नहीं होगा... क्योंकि हिंदुस्तान का एक धड़ा इस नियम के खिलाफ है... हालांकि कुछ मीडिया चैनल्स इसके फायदे भी बता रहे हैं, लेकिन आप शांत दिमाग से तीन सवालों का जवाब सोचिए.
सिर्फ आम जनता ही नहीं डॉक्टर भी इसका विरोध कर रहे हैं... फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने बकायदा स्वास्थ्य मंत्रालय को लेटर लिखकर पूछा है कि पिछले हाई कटऑफ को पाने के लिए उम्मीदवारों ने कई साल मेहनत की, लेकिन एनबीई ने बिना किसी ठोस कारण या सलाह के इसे अचानक कम कर दिया, इससे मेरिट की भावना कमजोर होगी, टॉपर उम्मीदवारों का मनोबल गिरेगा और कम स्कोर वाले उम्मीदवारों के कारण मरीजों की देखभाल पर असर पड़ सकता है.
अब अगर किसी डॉक्टर की जानकारी कम होगी, तो वो मरीजों को रेफर भी ज्यादा करेगा, जैसे आपके गांव के नजदीकी अस्पताल में बड़े केस नही संभलते और उन्हें बड़े अस्पताल में रेफर कर दिया जाता है, उसकी संख्या भी आने वाले दिनों में इस नियम के लागू होने के बाद बढ़ेगी, इसीलिए लोग ये पूछ रहे हैं कि क्या ये नियम सिर्फ राजनीति चमकाने के लिए है.
आरक्षण की व्यवस्था तो 10 साल बाद हालात देखकर खत्म होने वाली थी, ऐसी चर्चाएं भी आरक्षण में बदलाव पर उठती रही है, फिर आम जनता की जान से खिलवाड़ वाला फैसला क्यों, चुनाव जरूरी है या जान, फैसला आपके हाथ में है... अगर सरकार की इस फैसले के पीछे कोई फायदे वाली मंशा है तो वो भी स्पष्ट होना चाहिए, ताकि सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक इस कदर विरोध न बढ़े...