नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) ने नए नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP 2020) के तहत पोस्टग्रेजुएट (पीजी) हिस्ट्री सिलेबस में बड़ा बदलाव करते हुए दिल्ली सल्तनत से जुड़े अहम पेपर को पूरी तरह हटा दिया है. एमए हिस्ट्री के तीसरे सेमेस्टर से ''द दिल्ली सल्तनत: स्ट्रक्चर्स ऑफ अथॉरिटी इन मेडिवल नॉर्थ इंडिया (13वीं-14वीं शताब्दी)'' नाम का यह कोर कोर्स अब गायब हो गया है. 7 अगस्त को जारी नए सिलेबस नोटिफिकेशन के बाद अकादमिक काउंसिल के कई सदस्यों ने इसका कड़ा विरोध जताया है.
क्या था यह पेपर और क्यों था महत्वपूर्ण?
पिछले कई दशकों से यह पेपर मध्यकालीन भारत के एक जरूरी कोर्स के रूप में पढ़ाया जा रहा था. इसमें छात्रों को समझाया जाता था कि दिल्ली सल्तनत कैसे बनी, राजनीतिक सत्ता का ढांचा कैसा था, उत्तर भारत में शक्ति का इस्तेमाल कैसे होता था और उस दौर के राजनीतिक, धार्मिक व सांस्कृतिक विकास क्या थे. यूजी लेवल पर सिर्फ सतही सर्वे होता है, जबकि पीजी में यह स्पेशलाइज्ड और थीमेटिक अध्ययन होता था.
दिल्ली सल्तनत का इतिहास संक्षेप में
दिल्ली सल्तनत की शुरुआत 1206 ईस्वी में कुतुबुद्दीन ऐबक से हुई. गुलाम (ममलुक), खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी वंशों ने 13वीं से 16वीं शताब्दी तक राज किया. रजिया सुल्तान, बलबन, अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद बिन तुगलक, फिरोज शाह तुगलक और इब्राहिम लोदी जैसे शासकों ने उत्तर भारत की सियासत, संस्कृति और समाज को आकार दिया. 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर के हाथों इब्राहिम लोदी की हार के साथ इसका अंत हो गया.
और भी कई पेपर्स हटाए गए
सिर्फ दिल्ली सल्तनत ही नहीं, बल्कि ''हिस्ट्री ऑफ नॉर्थ इंडिया (1400-1550 सीई)'', ''जेंडर एंड विमेन इन अर्ली इंडिया: 1500 बीसी टू 1000 सीई'', ''पॉलिटिकल प्रोसेस एंड स्ट्रक्चर ऑफ पॉलिटीज इन एंशिएंट इंडिया'' और ''रिलिजन एंड सोसाइटी इन एंशिएंट इंडियन लिटरेचर'' जैसे कई महत्वपूर्ण पेपर्स भी सिलेबस से गायब कर दिए गए हैं. इतिहास विभाग ने 38 डिसिप्लिन स्पेसिफिक इलेक्टिव (DSE) पेपर्स प्रस्तावित किए थे, लेकिन अंतिम सिलेबस में सिर्फ 16 ही शामिल किए गए.
विरोध और आलोचना
अकादमिक काउंसिल सदस्य प्रोफेसर माया जॉन ने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे इतिहास विभाग की स्वायत्तता का हनन बताया. उनका कहना है कि विभाग के पास अपना सिलेबस तय करने की विशेषज्ञता है और इन बदलावों के पीछे अकादमिक से ज्यादा राजनीतिक कारण नजर आते हैं. यूनिवर्सिटी कैंपस में इस फैसले को लेकर चर्चा और बवाल जारी है.