तेहरान: ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में शिया परंपरा और कर्बला की घटना एक बार फिर जिंदा हो उठी. हजारों श्रद्धालुओं ने उनके जनाजे में इमाम हुसैन की शहादत और जुल्म के खिलाफ प्रतिरोध का नारा लगाया. तेहरान में खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान लाल झंडे लहरा रहे थे, जो इमाम हुसैन की याद दिलाते हैं. श्रद्धालु कर्बला की घटना का जिक्र करते हुए कह रहे थे कि खामेनेई भी इमाम हुसैन की राह पर चले और शहादत (शहीदी) का रास्ता अपनाया.
एक शोक संतप्त ने भारती टीवी चैनल से बात करते हुए कहा, ''शहादत कुरान में है. जो अल्लाह और इंसानियत की खातिर अपनी जान देता है, वह शहीद है. इमाम हुसैन का संदेश है कि जुल्म के आगे कभी झुको मत, चाहे इसके लिए अपनी जान क्यों न देनी पड़े. यह संदेश सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं, पूरी इंसानियत के लिए है.''
कर्बला का प्रतीक
ईरान में खामेनेई की मौत को शिया समुदाय अपनी धार्मिक और राजनीतिक पहचान से जोड़कर देख रहा है. उनके जनाजे में शामिल लोग मानते हैं कि इमाम हुसैन (680 ईस्वी में कर्बला की जंग) की शहादत आज भी जुल्म के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देती है. यह घटना दिखाती है कि ईरान में धार्मिक आस्था और राजनीति कितने गहरे से जुड़ी हुई हैं.