बिहार में नेटवर्क मार्केटिंग की तरह चलता सैक्स रैकेट, 50 होटल्स में नेता-अफसर को होती छोटी लड़कियों की सप्लाई, उम्र के हिसाब से बढ़ता कमीशन

Rahul Jadaun 05 Jul 2026 08:43: PM 2 Mins
बिहार में नेटवर्क मार्केटिंग की तरह चलता सैक्स रैकेट, 50 होटल्स में नेता-अफसर को होती छोटी लड़कियों की सप्लाई, उम्र के हिसाब से बढ़ता कमीशन

पटना: मैं मुंगेर जिले के एक गांव से हूं। पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करने और पैसे कमाने का सपना था। जॉब के लिए पटना आई, कई जगह काम किया, 15-20 हजार सैलरी मिलती थी। इतने में खुद का खर्च और घर पैसे भेजना मुश्किल होता था। ज्यादा पैसे कमाना चाहती थी, नई नौकरी की तलाश में मोनू से मिली। उसने मुझे इस दलदल में उतार दिया।’

जिस्म के धंधे में कमाई अच्छी हो रही थी। मोनू के होटल में रहती, खाने-पीने का इंतजाम भी वही करता था। मेकअप और कपड़े पर खुद खर्च करती। घर पर अच्छे पैसे भेज रही थी। मम्मी-पापा को बता रखा था कि नेटवर्क कंपनी में काम कर रही हूं। मैं पकड़ी गई। अब क्या होगा? ज्यादा पैसे कमाने की चाहत ने मुझे बर्बाद कर दिया।’

ये शब्द उस लड़की के हैं जो कम उम्र में ही जिस्म फरोशी के धंधे में धकेल दी गई। भास्कर न्यूज ने अपनी एक रिपोर्ट में जिस्म फरोशी का धंधा करने वाले गिरोह का खुलासा किया है। इस रिपोर्ट को देखने का बाद पता चलता है कि- देश में अपराध के तौर-तरीके अब पूरी तरह से 'कॉर्पोरेट' रूप अख्तियार कर रहे हैं। पुलिस और जांच एजेंसियों की हालिया कार्रवाई में एक ऐसे बेहद शातिर और हाईटेक देह व्यापार (Prostitution) गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है, जिसे जानकर अधिकारियों के भी होश उड़ गए हैं। यह पूरा रैकेट किसी आम अवैध धंधे की तरह नहीं, बल्कि एक पेशेवर 'नेटवर्क मार्केटिंग कंपनी' (MLM - Multi Level Marketing) की तर्ज पर संचालित किया जा रहा था। गिरोह ने बाकायदा टारगेट, इंसेंटिव, चेन सिस्टम और डिजिटल हायरिंग का एक पूरा नेटवर्क तैयार कर रखा था।

चेन सिस्टम: लड़कियों को जोड़ने पर मिलता था भारी कमीशन

जांच में सामने आए तथ्यों के मुताबिक, इस रैकेट के सरगनाओं ने धंधे को बढ़ाने के लिए नेटवर्क मार्केटिंग का फॉर्मूला अपनाया था। गिरोह से जुड़ी पुरानी लड़कियों को यह लालच दिया जाता था कि अगर वे अपने साथ नई युवतियों या महिलाओं को इस नेटवर्क का हिस्सा बनाएंगी, तो उन्हें सीधे तौर पर मोटा कमीशन (रेफरल बोनस) दिया जाएगा। सिर्फ इतना ही नहीं, जैसे-जैसे नई लड़कियां इस दलदल में आगे काम करती थीं, उन्हें जोड़ने वाली पुरानी मेंबर को उनके हर काम का एक निश्चित प्रतिशत (पैसिव इनकम की तरह) मिलता रहता था। इसी चेन सिस्टम के कारण यह नेटवर्क बहुत कम समय में कई शहरों में फैल गया।

बकायदा तय थे वीकली टारगेट और इंसेंटिव

हैरान करने वाली बात यह है कि इस अवैध नेटवर्क में काम करने वाली युवतियों और एजेंटों के लिए बाकायदा 'हफ़्तावार टारगेट' (Weekly Targets) तय किए गए थे। जो एजेंट या युवती ज्यादा से ज्यादा कस्टमर्स लाती थी या कंपनी के रेवेन्यू को बढ़ाती थी, उसे 'बेस्ट परफॉर्मर' का टैग देकर एक्स्ट्रा इंसेंटिव और लग्जरी गिफ्ट्स दिए जाते थे। गिरोह का पूरा हिसाब-किताब डायरियों में नहीं, बल्कि एन्क्रिप्टेड क्लाउड ऐप्स और डिजिटल स्प्रेडशीट्स पर रखा जाता था, ताकि पुलिस की नजरों से बचा जा सके।

कस्टमर केयर और कोड वर्ड का इस्तेमाल

इस रैकेट को चलाने के लिए बकायदा बैक-एंड टीम काम कर रही थी, जो वर्चुअल नंबर्स के जरिए कस्टमर केयर की तरह ग्राहकों से डील करती थी। ग्राहकों की प्रोफाइल की पूरी छानबीन (बैकग्राउंड वेरिफिकेशन) करने के बाद ही उन्हें कोड वर्ड में लोकेशन और समय बताया जाता था। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल युग में अपराधियों द्वारा इस तरह की बिजनेस स्ट्रेटेजी का इस्तेमाल करना बेहद चिंताजनक है। फिलहाल पुलिस इस गिरोह के मुख्य सरगनाओं और उनके बैंक खातों को खंगाल रही है ताकि इस मल्टी-लेवल रैकेट की जड़ों को पूरी तरह उखाड़ा जा सके।

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