वाशिंगटन/तेहरान: अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज की खाड़ी की प्रभावी रूप से बंदी के कारण दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, इस संकट ने 1973 और 1979 के तेल संकटों से भी बड़ा झटका दिया है. ट्रंप प्रशासन ने ऊर्जा कीमतों को काबू में रखने के लिए रूस और यहां तक कि ईरान से तेल खरीद पर कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी ढील दी है.
अमेरिका और यूरोप में तेल-गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे ट्रंप की राजनीतिक स्थिति भी दबाव में आ गई है. ईरान ने हॉर्मुज को बंद घोषित कर दिया है और जहाजों पर हमले जारी रखे हैं, जबकि अमेरिका ने ईरान के पावर प्लांट्स पर हमले की धमकी दी है. ट्रंप ने हाल ही में 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था, लेकिन बाद में बातचीत का हवाला देकर इसे पांच दिन के लिए टाल दिया. विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार को कंट्रोल करने के लिए ट्रंप ने यह कदम उठाया था.
एशिया और दुनिया भर में प्रभाव
यह संकट अब केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहा. कई देशों में ऊर्जा की कमी से दैनिक जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. लाओस में 40 प्रतिशत से ज्यादा गैस स्टेशन बंद हो चुके हैं, लंबी कतारें लग रही हैं. दक्षिण कोरिया में ईंधन की बचत के लिए एलिवेटर के इस्तेमाल पर रोक, कम नहाने और वॉशिंग मशीन सिर्फ दो दिन इस्तेमाल करने की अपील की गई है.
नेपाल में खाना पकाने के गैस की कमी से कई परिवार रोजाना खाना नहीं बना पा रहे, पुराना या ठंडा खाना खाने को मजबूर हैं. भारत में इंडक्शन चूल्हों की मांग बढ़ गई है, पुणे जैसे शहरों में गैस से अंतिम संस्कार पर अस्थायी रोक लगा दी गई है. फिलीपींस में राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दी गई है. एक अखबार ने लिखा, "तेल आपदा के कारण देश उस कगार पर है जहां जो कुछ हमने बनाया, सब खत्म होने वाला है."
IEA के मुताबिक, इस झटके में बाजार से जितना तेल निकला है, वह 1973 और 1979 के संकटों के कुल प्रभाव से भी ज्यादा है. 9 देशों में दर्जनों ऑयल रिफाइनरी, प्राकृतिक गैस फील्ड्स और अन्य ऊर्जा स्रोत तबाह हो चुके हैं.
आगे क्या हो सकता है?
हॉर्मुज खाड़ी जितने दिन बंद रहेगी, स्थिति उतनी ही बिगड़ती जाएगी. अगर रास्ता तुरंत खुल भी जाए, तो सामान्य स्थिति में लौटने में हफ्तों से लेकर साल भर लग सकता है. अमेरिका कह रहा है कि रास्ते पर उसका और ईरान का दोनों का कंट्रोल होगा, लेकिन दोनों पक्ष अभी अड़े हुए हैं. ईरान ने कुवैत के रास लफ्फान (दुनिया का सबसे बड़ा लिक्विफाइड गैस स्रोत) पर हमला किया है, जहां 17 प्रतिशत क्षमता पहले ही नष्ट हो चुकी है. आगे आसपास की बची रिफाइनरियों पर भी हमले की आशंका है. फिलीपींस के राष्ट्रपति ने सही कहा कि हम उस युद्ध के पीड़ित हैं जिसमें हमारा कोई हिस्सा नहीं है.
विभिन्न देशों का हस्तक्षेप
सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अमेरिका पर युद्ध जारी रखने का दबाव बना रहे हैं और इसे मध्य पूर्व को फिर से आकार देने का ऐतिहासिक अवसर बता रहे हैं. ट्रंप का कहना है कि ईरान समझौते के लिए तैयार है और बातचीत चल रही है, लेकिन ईरान साफ इनकार कर रहा है. इजरायल दक्षिणी लेबनान पर हमले जारी रखे हुए है और क्षेत्र विस्तार की कोशिश कर रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह युद्ध अब सिर्फ अमेरिका-इजरायल-ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और आम लोगों पर इसका गहरा असर पड़ रहा है. फिलहाल स्थिति सामान्य होती नहीं दिख रही. दुनिया को और बुरे दौर के लिए तैयार रहना होगा. ऊर्जा बचत, राशनिंग और आर्थिक चुनौतियां आने वाले दिनों में और बढ़ सकती हैं.
दुनिया को पीएम मोदी से आस
हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात की. इस दौरान उन्होंने मध्य पूर्व की स्थिति और होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने का महत्व बातचीत हुई. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत तनाव कम करने में अग्रणी भूमिका निभा सकते है, क्योंकि हिंदुस्तान के इजरायल के साथ-साथ ईरान और खाड़े देशों के साथ भी अच्छे संबंध हैं.