लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शनिवार को एक संवेदनशील मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया. कोर्ट ने मेरठ के एसएसपी को अपने आदेश की अवहेलना और लापरवाही बरतने के लिए शाम 4 बजे तक कोर्ट रूम में ही खड़ा रखा. साथ ही आरोपी की जमानत तत्काल रद्द कर उसे हिरासत में भेजने का आदेश दिया. मामला मेरठ के सरधना थाने में दर्ज एक मुकदमे से जुड़ा है.
हाईकोर्ट की पीठ ने 18 मार्च को आरोपी को इस शर्त पर जमानत दी थी कि वह पीड़िता से शादी करेगा. लेकिन जेल से बाहर आने के बाद आरोपी अपने वादे से मुकर गया. पीड़िता ने अंडरटेकिंग के उल्लंघन का हवाला देते हुए जमानत रद्द करने की अर्जी दाखिल की. शनिवार को सुनवाई के दौरान पीड़िता और आरोपी दोनों कोर्ट में मौजूद थे. आरोपी ने साफ कह दिया कि वह पीड़िता से शादी नहीं करेगा. इस पर न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने तुरंत जमानत रद्द कर दी और मौके पर मौजूद एसएसपी मेरठ को निर्देश दिया कि आरोपी को तुरंत हिरासत में लेकर संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करें.
एसएसपी को क्यों मिली ये सजा?
इससे पहले 28 सितंबर को कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर एसएसपी मेरठ को उसे सीधे हाईकोर्ट में पेश करने का आदेश दिया था. लेकिन पुलिस ने आरोपी को हाईकोर्ट लाने की बजाय सीजेएम मेरठ की अदालत में पेश कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.
एसएसपी ने कोर्ट में स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि वे 28 सितंबर से 2 अक्टूबर तक अवकाश पर थे और उनके अधीनस्थों से चूक हुई. कोर्ट ने इसे मातहतों की लापरवाही तो माना, लेकिन साफ कहा कि वारंट के निष्पादन प्राधिकारी स्वयं एसएसपी थे. इसलिए आरोपी को हाईकोर्ट में पेश कराना उनकी जिम्मेदारी थी. कोर्ट ने उनके खिलाफ कोई और प्रतिकूल आदेश पारित न करते हुए उन्हें शाम 4 बजे तक कोर्ट में मौजूद रहने का निर्देश दिया और भविष्य में सतर्क रहने की चेतावनी दी.
सीजेएम के खिलाफ भी कार्रवाई के निर्देश
कोर्ट ने मेरठ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) के आचरण पर भी गंभीर नाराजगी जताई. कोर्ट ने कहा कि सीजेएम को पता था कि हाईकोर्ट ने आरोपी को सीधे पेश करने का आदेश दिया है, फिर भी उन्होंने आरोपी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया.
इसे घोर लापरवाही और अनुशासनहीनता करार देते हुए कोर्ट ने आदेश की प्रति मेरठ के प्रशासनिक न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया, ताकि सीजेएम के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की जा सके. यह आदेश न सिर्फ अदालती आदेशों के पालन की अहमियत को रेखांकित करता है, बल्कि पुलिस और न्यायिक अधिकारियों की जवाबदेही भी साफ करता है.