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पटना: 20 साल पहले जो बिहार बीमारू राज्य के रूप में जाना जाता था, जहां से रोजगार की तलाश में लोग दिल्ली-मुंबई जाने को मजबूर होते थे, जहां फैक्ट्रियों के नाम पर चंद कारखाने थे, नए निवेशक रंगदारी देने के डर से दूर भागते थे, वो बिहार नीतीशराज में ऐसा बदला कि आज उसने सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. अपने सात निश्चय से नीतीश ने बिहार की सूरत बदलकर रख दी. जिस बिहार से भारी संख्या में पलायन होता था, वहां बीते 5 सालों में 7 लाख 24 हजार लोगों को रिकॉर्ड सरकारी नौकरी दी गई, जिसमें दूसरे राज्यों के लोग भी शामिल हैं.
आज बिहार न सिर्फ तरक्की की नई कहानियां लिख रहा है, बल्कि पलायन को लेकर जो नया डाटा आया है, उसे सुनकर हर बिहारवासी नीतीश कुमार के दूरदर्शी सोच को सैल्यूट करेगा, पहले नया आंकड़ा देखिए जो ई श्रम पोर्टल ने जारी किया है, उसके बाद बताते हैं ये कैसे संभव हुआ. बिहार में सरकारी नौकरियों में हो रही बढ़ोत्तरी और रोजगार के नए अवसर के चलते भारी संख्या में लोग वापस लौट रहे हैं, अब 2 करोड़ 90 लाख लोग रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन किए हुए हैं, जबकि पहले ये आंकड़ा 5 करोड़ के पार था.
इनमें भारी संख्या उन लोगों की भी है, जो नौकरी की तलाश में नहीं बल्कि अच्छे पैकेज की तलाश में बिहार से बाहर हैं. चाहे वो अमेरिका-इंग्लैंड या मॉरीशस में रहने वाले लोग हों या फिर दिल्ली-मुंबई में रहकर लाखों-करोड़ों कमाने वाले बिहारी. जिस बिहारी शब्द को कभी मराठा में अपमानजनक समझा जाता था, कोरोनाकाल में उन्हीं बिहारियों को बड़े-बड़े बिजनेसमैन ने फ्लाइट का टिकट देकर बुलाया. क्योंकि नीतीश कुमार ने साफ ऐलान कर दिया था कि हम सबको नौकरी देंगे, आप संकल्प लीजिए, नून रोटी खाएंगे, पर बिहार छोड़कर नहीं जाएंगे.
करोड़ों रोजगार पैदा करने वाले नीतीश कुमार को आज जनता बिहार का विश्वकर्मा इसलिए भी कहती है, क्योंकि इन्होंने बिहार को जंगलराज के दौर से निकालकर मंगलराज तक पहुंचाया है, और ये सब एक दिनों में संभव नहीं था, इसीलिए 15 सालों का वक्त नीतीश कुमार को लगा, तभी तो नीतीश कुमार सदन में खड़े होकर कहते हैं पहले कुछ था जी, हमने तो तस्वीर बदलकर रख दी है.
नीतीश कुमार का ये बयान पूरे लालू परिवार को चुभता है, क्योंकि उन्हें पता है जनता लालटेन वाले युग से निकलकर बिजली वाले दौर में पहुंच गई है. अब वो जाति के नाम बेवकूफ बनने को राजी नहीं है. उसे अपने गांव की सड़के चकाचक चाहिए, उसे गांव में बिजली और पानी की सुविधा चाहिए, उसे अपने जिले में फैक्ट्री और रोजी-रोजगार चाहिए, जहां रहकर वो दिल्ली-मुंबई से कुछ हजार कम भी कमाए तो चलेगा, और नीतीश कुमार इन चीजों को भली-भांति समझते हैं, इसीलिए साल 2005 में सीएम बनते ही सबसे पहले अपराध पर नियंत्रण किया, ताकि नए निवेशक बाहर से आएं, साल 2011 में औद्योगिक नीति को बढ़ावा दिया, बड़े-बड़े बिजनेसमैन को निवेश के लिए प्रेरित किया, आधारभूत संरचनाओं के विकास के लिए 50 हजार करोड़ मंजूर किए, जिससे 50 लाख रोजगार पैदा होंगे और लेदर पॉलिसी और टेक्सटाइल पॉलिसी लॉन्च की गई है, लौट आइए बिहार में का नारा दिया जा रहा है.
इसका असर ये हुआ कि बिहार में लोग न सिर्फ वापस लौट रहे बल्कि बाहरी लोग भी नौकरी करने जा रहे हैं, जिसका जीता-जागता उदाहऱण आपने शिक्षक भर्ती में देखा होगा, कैसे यूपी के कई अभ्यर्थियों ने फॉर्म भरा और उन्हें बिहार में नौकरी मिली. सरकारी नौकरी देने में बिहार देश का अव्वल राज्य बन गया, जीविका से लेकर घरेलू उद्योग तक में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है. ये नीतीश कुमार के दूरदर्शी सोच का ही नतीजा है, जिसने बिहार को बीमारू राज्य से निकालकर प्रगतिशील राज्यों की सूची में पहुंचा दिया है, नीतीश कुमार के दशकों से इस मेहनत को एक सैल्यूट तो बनता है.