नई दिल्ली: मध्य पूर्व में चल रहे तनाव और ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर गहरा असर पड़ रहा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण मार्ग प्रभावित होने से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है, जो हाल के दिनों में 8-30% तक बढ़ चुकी हैं. भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है, ऐसे समय में स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करने के प्रयास में जुटा है.
इस संकट के बीच अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने 5 मार्च 2026 से पहले लोड किए गए रूसी तेल के जहाजों के लिए भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिनों की अस्थायी छूट (Waiver) देने की घोषणा की. अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने इसे एक अस्थायी उपाय बताया, जिसका मकसद वैश्विक बाजार में तेल का बहाव जारी रखना है, ताकि ईरान से जुड़े जोखिमों से दबाव कम हो. यह छूट केवल समुद्र में फंसे पहले से लोडेड कार्गो पर लागू है, न कि नई खरीद पर और इससे रूस को ज्यादा आर्थिक फायदा न पहुंचे, ऐसा अमेरिका का दावा है.
हालांकि भारत ने इस छूट को स्वीकार करने की बजाय साफ-साफ रुख अपनाया. सरकार के सूत्रों और आधिकारिक बयानों के अनुसार, भारत रूस से तेल खरीदने के लिए किसी अन्य देश की मंजूरी या छूट पर निर्भर नहीं है. यह देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा, उपलब्धता और किफायती दामों के आधार पर फैसले लेता है. रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है, और फरवरी 2026 में भी आयात जारी था. रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद मिली रियायती कीमतों ने भारत के लिए इसे आकर्षक बनाया है.
भारत ने दो टूक कहा कि वह ऐसी अल्पकालिक व्यवस्थाओं पर निर्भर नहीं करता. देश के पास 250 मिलियन बैरल से अधिक का क्रूड और पेट्रोलियम उत्पादों का भंडार है, जो अल्पकालिक व्यवधानों से निपटने के लिए काफी है. रूस की तरफ से भी प्रतिक्रिया आई, जहां क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा कि भारत को रूसी तेल निर्यात के सटीक आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे, क्योंकि कई ताकतें इसे नुकसान पहुंचाना चाहती हैं.