नई दिल्ली: भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आयात नीति खुद तय करेगा. अमेरिका का कोई भी फैसला भारत को रूस से तेल या एलपीजी खरीदने से नहीं रोक सकता. अमेरिकी वित्त मंत्री ने हाल ही में घोषणा की कि रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर दी गई अस्थायी छूट को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. यह छूट उन कार्गो के लिए थी जो पहले से रास्ते में थे. ईरानी तेल पर भी यही व्यवस्था खत्म कर दी गई है. लेकिन भारतीय अधिकारियों का साफ कहना है कि यह अमेरिका का अपना फैसला है.
इससे भारत की खरीद रणनीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा. रूस से कच्चा तेल और एलपीजी दोनों का आयात जारी रखने की तैयारी है. उन कंपनियों और संस्थाओं से खरीदारी चलेगी जिन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा है. हाल ही में भारतीय रिफाइनरियों ने रूस, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से कुल 8 लाख टन एलपीजी की आपूर्ति हासिल की है.
अब आगे के कार्गो के लिए बातचीत चल रही है. रूस से एलपीजी की जो डील अब तक हुई है, वह मात्रा में अभी सीमित है और खेप भारत पहुंचनी बाकी है. इसके अलावा अन्य स्रोतों से भी ज्यादा एलपीजी लाने की कोशिशें जारी हैं. एलपीजी के मामले में अमेरिका अभी भी भारत का सबसे बड़ा सप्लायर बना रहने की संभावना है.
इसके अलावा कनाडा से भी आपूर्ति की उम्मीद है और अंगोला के साथ अतिरिक्त कुकिंग गैस के लिए चर्चा चल रही है. कच्चे तेल की बात करें तो युद्ध से पहले पश्चिम एशिया से भारत का करीब 60% आयात होता था. अब यह घटकर लगभग 30% रह गया है. वहीं रूस से तेल का आयात पिछले कुछ समय में काफी बढ़ा है. मार्च में रूस से तेल का आयात महीने-दर-महीने दोगुना हो गया.
CREA के आंकड़ों के मुताबिक मार्च में चीन के बाद भारत रूसी फॉसिल फ्यूल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार रहा. भारत सरकार का रुख हमेशा से साफ रहा है कि वह कमर्शियल फायदे और विविध आपूर्तिकर्ताओं के आधार पर ऊर्जा खरीदती है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी कहा कि भारत अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीद रहा है.