नई दिल्ली: अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चले 28 दिन के तीव्र युद्ध के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर को 6 अप्रैल तक बढ़ा दिया है. लेकिन विश्लेषक के अनुसार, यह बढ़ोतरी अमेरिका की सैन्य हार को छिपाने और ट्रंप की घरेलू राजनीतिक इज्जत बचाने का प्रयास है, न कि ईरान को हराने का.
विशेषज्ञ दावा कर रहे हैं कि अमेरिकी कैबिनेट की बैठक में उपराष्ट्रपति जेडी वैंस, मार्को रुबियो समेत अन्य अधिकारियों ने माना कि ईरान को सैन्य रूप से हराना संभव नहीं है. अमेरिका की साख पर धब्बा लग गया है. ईरान ने स्ट्रेट होर्मुज पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया है और वहां टोल टैक्स अब डॉलर की बजाय युआन में वसूल रहा है. इससे पारंपरिक आर्थिक व्यवस्था को चुनौती मिल रही है. ईरान ने 10 लाख सैनिकों की विशाल फौज तैयार कर ली है.
सहयोगी बलों में भर्ती की उम्र सीमा घटा दी गई है. ईरान अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत समुद्री मार्गों पर चेकपॉइंट और नियंत्रण का दावा कर रहा है. वहीं इजराइल कई मोर्चों (ईरान, हिजबुल्लाह, गाजा) पर जूझ रहा है. इजराइल में सैनिकों की कमी (15,000 की कमी) है और 80,000 योग्य पुरुष सेना में नहीं जुड़ रहे हैं. नेतन्याहू ने अनिवार्य सेवा अवधि बढ़ा दी है.
अमेरिका में भी युद्ध की लागत और विस्तार के खिलाफ डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन्स दोनों तरफ से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. ईरान ने यूएई, कतर, कुवैत और बहरीन में अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए और नागरिकों को अल्टीमेटम जारी किया. ईरान ने जर्मनी, भारत, स्पेन जैसे देशों को धन्यवाद दिया कि उन्होंने अमेरिका का साथ नहीं दिया.
ईरान रूस और चीन के साथ गठबंधन मजबूत कर रहा है. ब्रिक्स की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं और ईरान ने भारत से युद्ध के खिलाफ आवाज उठाने की अपील की है. रूस इस संघर्ष से आर्थिक लाभ उठा रहा है.