रियाद: सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल ही में हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की असलियत महज 48 घंटे में सामने आ गई. शुक्रवार को तीनों देशों के नेताओं ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे ‘इस्लामिक नाटो’ भी कहा जा रहा था. इसी बीच यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के जाजान स्थित अरामको रिफाइनरी पर ड्रोन हमला कर दिया.
इसके बावजूद पाकिस्तान और तुर्की की ओर से कोई सैन्य कार्रवाई या धमकी नहीं आई. समझौते में साफ कहा गया था कि किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा. फिर भी जाजान हमले के बाद दोनों सहयोगी देश पूरी तरह खामोश रहे. सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने रिफाइनरी में आग लगने की पुष्टि की, जिसे बाद में बुझा लिया गया.
हूती प्रवक्ता याह्या सारी ने इसे सऊदी के ड्रोन ऑपरेशनों का जवाब बताया. तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फिदान ने इस समझौते को नाटो के आर्टिकल-5 जैसा बताया था, लेकिन साथ में यह भी साफ किया था कि तुरंत सैन्य कार्रवाई अपने आप शुरू नहीं होगी.
सदस्य देश पहले सलाह-मशविरा करेंगे. विश्लेषकों का कहना है कि यह गठबंधन जमीनी स्तर पर तुरंत कार्रवाई करने में सक्षम नहीं दिख रहा. पहले भी सऊदी-पाकिस्तान रक्षा समझौतों में पाकिस्तान ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया था. जाजान घटना ने नए समझौते की राजनीतिक और सैन्य कमजोरियों को उजागर कर दिया है.