रांची: राजधानी रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से उठ रही सिसकियां और गूंजते नारे केवल कुछ अभ्यर्थियों का विरोध नहीं, बल्कि सालों की मेहनत, टूटी उम्मीदों और सिस्टम की अनदेखी से जूझ रहे लाखों युवाओं की साझा दास्तान हैं। जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) की भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन का सबसे भावुक और मार्मिक चेहरा बनकर उभरी हैं छात्रा हबीबा नाज। कई दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठीं हबीबा की गिरती सेहत के बावजूद उनकी आवाज में वही अड़िग संकल्प है, जो किताबों में अपने सपनों को तलाशने वाले हर मध्यमवर्गीय छात्र के सीने में धड़कता है।
'जब सब रास्ते बंद दिखे, तो भूख हड़ताल ही चुनी' हबीबा नाज अपने हाथों में ड्रिप और कमजोर होती सांसों के बीच धरना स्थल पर डटी हुई हैं। उनका कहना है कि यह लड़ाई केवल किसी एक परीक्षा की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ है जो बार-बार पेपर लीक, अनियमितताओं और परीक्षा रद्द होने के अंतहीन चक्र में नौजवानों की पूरी जवानी को झोंक देती है।
आंखों में नमी और चेहरे पर दर्द समेटे हबीबा कहती हैं, "हम घर से पढ़ाई करने निकले थे, सड़क पर बैठने नहीं। मां-बाप ने पाई-पाई जोड़कर किताबों और कोचिंग की फीस भरी ताकि हम अफसर बन सकें। लेकिन यहां साल दर साल सिर्फ तारीखें मिलती हैं और फिर लीक की खबरें। जब अधिकारियों और सरकार ने हमारी बात सुनना बंद कर दिया, तो हमने अपने शरीर को ही इस लड़ाई का हथियार बना लिया। जब तक युवाओं को उनका हक और पारदर्शी परीक्षा का भरोसा नहीं मिलता, यह अनशन खत्म नहीं होगा।"
डॉक्टरों की निगरानी, साथियों की नम आंखें धरना स्थल पर मौजूद डॉक्टरों की टीम लगातार हबीबा और अन्य अनशनकारी छात्रों के स्वास्थ्य की निगरानी कर रही है। शुगर लेवल और ब्लड प्रेशर में लगातार आ रही गिरावट के बावजूद हबीबा ने अस्पताल जाने से इनकार कर दिया है। उनके साथ धरने पर बैठे सैकड़ों साथी छात्र-छात्राओं की आंखें नम हैं, लेकिन हौसले बुलंद हैं। साथी छात्रों का कहना है कि जब एक बेटी अपनी जान दांव पर लगाकर पूरे राज्य के छात्रों के भविष्य के लिए लड़ रही है, तो यह हर उस नौजवान की जिम्मेदारी है कि वह इस आवाज को दबने न दे।
लाखों युवाओं के संघर्ष का प्रतीक बनीं हबीबा हबीबा की यह भूख हड़ताल आज पूरे झारखंड के प्रतियोगी छात्रों के संघर्ष का प्रतीक बन चुकी है। सोशल मीडिया पर उनके वीडियो और तस्वीरें देखकर देश भर के छात्र उनके समर्थन में आवाज उठा रहे हैं। सवाल सिर्फ एक परीक्षा का नहीं है, सवाल उन अनगिनत रातों का है जो युवाओं ने एक कमरे में मोमबत्ती और किताबों के सहारे सिर्फ एक अदद नौकरी के सपने के साथ काटी हैं। सरकार और प्रशासन के साथ होने वाली बातचीत में लगातार हो रही देरी अब इन युवाओं के सब्र का इम्तिहान ले रही है।