लखनऊ : कांग्रेस नेता राहुल गांधी की कथित दोहरी नागरिकता से जुड़े हाई-प्रोफाइल मामले में खुद को अलग करने वाले जस्टिस सुभाष विद्यार्थी अचानक सुर्खियों में आ गए हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के इस जज का फैसला न सिर्फ न्यायपालिका में चर्चा का विषय बना, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई.
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का जन्म 30 अप्रैल 1970 को हुआ. उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से 1993 में एलएलबी की पढ़ाई पूरी की और 19 फरवरी 1994 को वकालत शुरू की. शुरुआती दौर में उन्होंने सिविल मामलों में लंबा अनुभव हासिल किया और धीरे-धीरे एक मजबूत कानूनी पहचान बनाई. उनकी प्रतिभा और अनुभव को देखते हुए 13 अक्टूबर 2021 को उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट में एडिशनल जज नियुक्त किया गया. इसके बाद 13 मार्च 2023 को वे स्थायी जज बने.
वर्तमान में वे बाराबंकी जिले के एडमिनिस्ट्रेटिव जज भी हैं और 2032 तक उनकी सेवाएं निर्धारित हैं. हाल ही में राहुल गांधी की नागरिकता से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस विद्यार्थी ने खुद को केस से अलग कर लिया. यह फैसला तब आया जब याचिकाकर्ता एस. विग्नेश शिशिर के साथ उनकी तीखी बहस हुई और मामला सोशल मीडिया तक पहुंच गया. याचिकाकर्ता ने एक्स पर लिखा कि जज के खिलाफ टिप्पणी करते हुए गंभीर आरोप लगाए और यहां तक कहा कि वे इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश तक ले जाएंगे. कोर्ट ने इन बयानों को अनुचित माना.
यह केस राहुल गांधी की कथित दोहरी नागरिकता को लेकर दायर याचिका से जुड़ा है. याचिकाकर्ता का दावा है कि 2005-06 में एक ब्रिटिश कंपनी के दस्तावेजों में राहुल गांधी को ब्रिटिश नागरिक बताया गया था, जो भारतीय कानूनों का उल्लंघन है. 17 अप्रैल की सुनवाई में अदालत ने एफआईआर दर्ज करने को लेकर मौखिक टिप्पणी की थी, लेकिन बाद में कानूनी पहलुओं की समीक्षा करते हुए जस्टिस विद्यार्थी ने अपना रुख बदला. उन्होंने कहा कि बिना नोटिस दिए ऐसा आदेश देना उचित नहीं है और अपने पहले के आदेश को संशोधित कर दिया.
याचिकाकर्ता द्वारा सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों और आरोपों को देखते हुए जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने नैतिक आधार पर खुद को इस मामले से अलग करना बेहतर समझा. उन्होंने केस की फाइल चीफ जस्टिस को भेज दी, ताकि नई बेंच गठित की जा सके. राहुल गांधी की नागरिकता पर सवाल पहली बार नहीं उठा है. 2019 में सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसकी अध्यक्षता रंजन गोगोई कर रहे थे, ने इसी तरह की याचिका खारिज कर दी थी. अदालत ने स्पष्ट किया था कि किसी कंपनी के दस्तावेज में नाम आने मात्र से किसी व्यक्ति की नागरिकता तय नहीं होती.