नई दिल्ली: मौलाना साजिद रशीदी के रेप और शरीयत कानून को लेकर दिए गए विवादित बयान पर देश में सियासी और धार्मिक बहस तेज हो गई है. मौलाना ने कहा कि जब तक भारत में इस्लामिक कानून यानी शरीयत लागू नहीं होगा, तब तक देश में रेप जैसी घटनाएं नहीं रुकेंगी. बयान सामने आने के बाद राजनीतिक दलों से लेकर मुस्लिम धर्मगुरुओं और हिंदू संतों तक ने इसकी आलोचना की है. प्रतिक्रियाओं में एक बात पर जोर दिया गया कि भारत की व्यवस्था संविधान के मुताबिक चलती है.
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने कहा कि भारत में बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का संविधान सर्वोपरि है. उन्होंने कहा कि अपराध करने वाले व्यक्ति को न्यायपालिका के जरिए दोषी साबित होने पर कानून के तहत सजा मिलती है और इसका किसी धर्म से संबंध नहीं है.
बीजेपी प्रवक्ता आर.पी. सिंह ने मौलाना के बयान पर निशाना साधते हुए कहा कि देश में पर्सनल लॉ लागू करने की सोच स्वीकार्य नहीं है. वहीं, बीजेपी के सहयोगी और सुभासपा नेता ओपी राजभर ने कहा कि भारत में रहने वाले हर व्यक्ति को संविधान के दायरे में रहना होगा. उन्होंने कहा कि अगर किसी को संविधान स्वीकार नहीं है तो उसे देश में रहने के अधिकार पर विचार करना चाहिए.
मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने कहा कि भारत न हिंदू राष्ट्र बन सकता है और न इस्लामी राष्ट्र. उनके मुताबिक देश में शरीयत कानून लागू करने की बात व्यावहारिक नहीं है और ऐसी बयानबाजी समाज के हित में नहीं है.
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने भी कहा कि भारत संविधान के अनुसार ही चलेगा. महिलाओं के खिलाफ अपराध और रेप रोकने के लिए देश में पहले से सख्त कानून मौजूद हैं. विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता विनोद बंसल और महंत शशिकांत दास ने भी बयान की आलोचना करते हुए कहा कि भारत की संप्रभुता और संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने वाली सोच स्वीकार नहीं की जा सकती. बयान के बाद यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन गया है.