लखनऊ : मुजफ्फरनगर दंगे की बरसी पर उत्तर प्रदेश में एक बार फिर सियासी पोस्टर वार देखने को मिल रहा है. 7 सितंबर को दंगों की बरसी के मौके पर लखनऊ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, सहारनपुर और शामली समेत कई शहरों में पोस्टर लगाए गए हैं. इन पोस्टरों पर लिखा है कि न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे. पोस्टरों के जरिए 2013 की हिंसा की यादें ताजा करते हुए तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार के कार्यकाल पर भी सवाल खड़े किए गए हैं.
दरअसल, 7 सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर में हिंसा भड़क उठी थी. इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में तनाव और हिंसा फैल गई. इस हिंसा में 60 से अधिक लोगों की जान गई थी, जबकि 50 हजार से ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़कर विस्थापित होना पड़ा था. हालात इतने बिगड़ गए थे कि हिंसा पर काबू पाने के लिए सेना की मदद तक लेनी पड़ी थी.
मुजफ्फरनगर दंगे तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार के लिए बड़े राजनीतिक संकट के तौर पर सामने आए थे. कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार पर गंभीर सवाल उठे थे. विपक्ष ने आरोप लगाया था कि सरकार हिंसा को समय रहते नियंत्रित करने में नाकाम रही, इसके साथ ही सपा सरकार पर दंगाइयों को राजनीतिक संरक्षण देने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए थे.
दंगों के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सैफई महोत्सव में शामिल होने को लेकर भी विपक्ष ने सवाल उठाए थे. इसे लेकर सरकार की संवेदनशीलता और प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर राजनीतिक बहस छिड़ गई थी.
अब दंगे की बरसी पर लगाए गए पोस्टरों ने एक बार फिर उस दौर की सियासी बहस को हवा दे दी है. ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ जैसे नारों के जरिए 2013 की हिंसा को याद किया जा रहा है. यूपी में लगे इन पोस्टरों से साफ है कि मुजफ्फरनगर दंगे का मुद्दा आज भी प्रदेश की राजनीति में संवेदनशील और चर्चित विषय बना हुआ है.