म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग पहली बार भारत दौरे पर पहुंचे, जहां उन्होंने भारत के शीर्ष नेतृत्व के साथ कई महत्वपूर्ण बैठकें कीं। इस दौरान दोनों देशों के बीच सीमा सुरक्षा, उग्रवाद और रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई।
राष्ट्रपति की पहली मुलाकात विदेश मंत्री एस. जयशंकर से हुई। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से बातचीत की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक में सीमा सुरक्षा, रोहिंग्या संकट और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर विशेष जोर दिया गया। वहीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भी उनकी मुलाकात हुई।
बैठकों के दौरान सबसे प्रमुख विषय भारत-म्यांमार सीमा और रोहिंग्या शरणार्थियों का रहा। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा कि म्यांमार में जारी संघर्ष के कारण बड़ी संख्या में लोग सीमा पार कर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, विशेषकर मिजोरम में प्रवेश करने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों की पहचान और वापसी की प्रक्रिया आसान नहीं है, इसलिए इस दिशा में दोनों देशों को मिलकर काम करने की जरूरत है।
भारत और म्यांमार के बीच लगभग 1,643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। सीमा के दोनों ओर सुरक्षा बल लगातार निगरानी रखते हैं। हालांकि उग्रवादी गतिविधियां और अवैध घुसपैठ दोनों देशों के लिए चुनौती बनी हुई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत और म्यांमार सुरक्षा और खुफिया सहयोग को और मजबूत करते हैं, तो सीमा पार गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण संभव हो सकता है। इससे क्षेत्र में स्थिरता बढ़ेगी और अवैध घुसपैठ की घटनाओं को भी कम किया जा सकेगा।
रोहिंग्या संकट को लेकर भी चर्चा तेज है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार बड़ी संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी फिलहाल बांग्लादेश में रह रहे हैं। इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र समेत कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी चर्चा हो चुकी है और उनके भविष्य को लेकर समाधान तलाशने की मांग उठती रही है।
जानकारों का कहना है कि रोहिंग्या संकट केवल मानवीय मुद्दा नहीं बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से भी जुड़ा हुआ विषय बन चुका है। ऐसे में भारत और म्यांमार के बीच बढ़ता सहयोग आने वाले समय में इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।