काठमांडू : नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ और फ्लैश फ्लड के बाद हालात लगातार गंभीर बने हुए हैं. भारी तबाही और हजारों लोगों के लापता होने के बीच नेपाल सरकार ने विदेशी मदद को लेकर अपना रुख बदल दिया है. अब भारत और चीन समेत अन्य देशों से तकनीकी और विशेषज्ञ सहायता लेने का फैसला किया गया है, इससे पहले नेपाल सरकार ने कहा था कि उसके अपने सुरक्षा बल खोज और बचाव अभियान संभालने में सक्षम हैं और विदेशी रेस्क्यू टीमों की जरूरत नहीं है.
नेपाल सरकार के इस फैसले के पीछे बड़ी संख्या में लापता लोगों और विदेशी नागरिकों को लेकर बढ़ा अंतरराष्ट्रीय दबाव भी माना जा रहा है. सरकार अब खास तौर पर डीएनए टेस्टिंग, फॉरेंसिक जांच और कठिन इलाकों में तकनीकी बचाव जैसे कामों में विदेशी विशेषज्ञों की मदद लेगी. नेपाल के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, सीमित संख्या में विशेषज्ञों को उन क्षेत्रों में काम करने की अनुमति दी जा रही है, जहां देश के पास पर्याप्त विशेषज्ञता नहीं है.
भारत ने नेपाल की मदद के लिए कदम पहले ही बढ़ा दिए हैं. भारतीय तकनीकी टीम काठमांडू पहुंच चुकी है और भारतीय वायुसेना राहत सामग्री पहुंचाने के अभियान में जुटी है. सी-130 विमान के जरिए दवाइयों, खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी सामान समेत करीब 10 टन राहत सामग्री नेपाल भेजी गई है. भारत की ओर से विशेषज्ञ सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है.
चीन की ओर से भी विशेषज्ञ सहायता पहुंची है. खासकर कठिन इलाकों और सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने के लिए तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत बताई गई है. रसुवा इलाके में हाइड्रोपावर परियोजना की सुरंग में फंसे लोगों को निकालना बड़ी चुनौती बना हुआ है.
इस प्राकृतिक आपदा में मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है. 29 अगस्त की रिपोर्टों के अनुसार नेपाल में 600 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 2,500 से 3,000 लोग लापता बताए जा रहे हैं. बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक भी प्रभावित हैं. भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार 88 भारतीयों को बचाया जा चुका है, जबकि 287 भारतीय अब भी लापता हैं.
बाढ़ ने सड़क, पुल, बिजली परियोजनाओं और कई बस्तियों को भारी नुकसान पहुंचाया है. अब नेपाल के सामने राहत-बचाव के साथ-साथ शवों की पहचान, लापता लोगों की तलाश और बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण की चुनौती है. विशेषज्ञों के मुताबिक तबाही के बाद नेपाल को आने वाले समय में अरबों डॉलर की आर्थिक मदद की जरूरत पड़ सकती है.