नई दिल्ली : सत्ता की कुर्सी में जिम्मेदारी के साथ घमंड का गुलदस्ता मिलता है. बालेन शाह जो अब तक प्यारे थे वो कुर्सी मिलते ही बेगाने हो गए. नायक की छवि 45 दिनों में ही खलनायक की तरह हो गई है. नेपाल में प्रधानमंत्री कार्यालय का नियम बदल गया. पहले भारत के लिए दरवाज़ा खुला करता था. हालांकि, अब रिश्तों की डोर बंद कर दी गई है.भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री पीएम मोदी के कहने पर नेपाल के पीएम बालेन शाह से मुलाकात करने नेपाल जाने वाले थे लेकिन बालेन शाह ने वक्त नहीं दिया.
ये सीधे तौर पर भारत को आंख दिखाने वाली बात है. जबकि, ट्रंप के बेहद ख़ास और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्गियो गोर के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय का दरवाज़ा बालेन शाह ने बंद कर दिया तो सवाल उठता है क्या नेपाल का भी यूक्रेन वाला हाल होने वाला है, वहां की जनता ने एक कॉमेडियन को सत्ता सौंपी थी जबकि नेपाल की जनता ने एक रैपर को देश सौंपा जिसे वो संभाल नहीं पा रहे हैं.
बालेन शाह अगर इसी तरह से आंख दिखाते रहे तो भारत सरकार कई फैसले ले सकती है. भारत में करीब 30 लाख से ज्यादा नेपाली रहते हैं, यूपी, बिहार और उत्तराखंड की सीमा से लाखों लोग रोज़ नेपाल-भारत आते-जाते हैं. भारत की 150 बड़ी कंपनियां नेपाल की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कही जाती हैं. भारत कई देशों से तेल खरीदकर नेपाल को देता है, नेपाल में डिजिटल पेमेंट भी भारत के सहयोग से चलता है.
ऐसे में अचानक नेपाली PM का फैसला कि अब भारत की सीमा से कोई अंदर आता है तो पहचान पत्र दिखाना होगा रिश्तों को तोड़ सकता है, इसके पहले वो 100 रुपए से ज्यादा के सामान पर टैक्स लगा चुके हैं, एक चिप्स का पैकेट भी लाना बहुत मुश्किल हो रहा है. 64 फीसदी ट्रेड भारत पर निर्भर करता है.
बालेन शाह के पीएम बनने से पहले ही जगद्गुरु ने दावा किया था कि ये भारत विरोधी व्यक्ति हो सकते हैं, पिछले दो महीने में ही 4 फैसलों से साबित हो जाता है कि नेपाल के नए पीएम मोदी के साथ हाथ मिलाकर नहीं बल्कि आंख दिखाकर चलना चाहते हैं. नेपाल की जनता ऐसा बिल्कुल नहीं सोचती है. नेपाल में योगी और मोदी को चाहने वाले लाखों-करोड़ों लोग हैं.
बालेन शाह एक मेयर से प्रधानमंत्री बन गए, सरकार चलाती है ब्यूरोक्रेसी यानी IAS और IAS अपने PM के फैसलों को ज़मीन पर लागू करते हैं. प्रधानमंत्री खुद अपने सलाहकारों से चलते हैं और नेपाल की यही कमज़ोरी है कि जब नेता नया या कमज़ोर हो तो अधिकारी अपनी चलाते हैं, जिसका असर भारत-नेपाल के रिश्तों पर साफ दिख रहा है. दो महीने पूरे हो रहे हैं लेकिन ना तो भारत की तरफ से कोई दिग्गज पहुंचा और ना ही नेपाल के पीएम का भारत दौरा हुआ.
ये संकेत किसी बड़ी घटना की तरफ इशारा कर रहे हैं. जनता किसी को चुनती है तो जनता हटा भी देती है. कौन ज़ेलेंस्की की तरह देश को बर्बादी में झोंकता है कौन देश की गाथा लिखता है ये वक्त तय करता है, लेकिन बालेन शाह की मनमानी अब भारत के लिए मुसीबत बन सकती है.