नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड्स यात्रा के दौरान एक महत्वपूर्ण घटना हुई. डच सरकार ने चोल वंश के बेहद कीमती और ऐतिहासिक तांबे के अभिलेख भारत को वापस सौंप दिए. ये ताम्रपत्र लंबे समय से लीडेन विश्वविद्यालय में रखे हुए थे और इन्हें ‘लीडेन प्लेट्स’ के नाम से जाना जाता है.
ये तांबे की प्लेटें चोल सम्राट राजराजा प्रथम के शासनकाल (985-1014 ईस्वी) से जुड़ी हैं. इनमें मुख्य रूप से नागपट्टिनम स्थित प्रसिद्ध बौद्ध विहार ‘चूड़ामणि विहार’ को दिए गए भूमि अनुदान, कर छूट और राजस्व संबंधी दस्तावेज़ दर्ज हैं. इस विहार का निर्माण इंडोनेशिया के श्रीविजय साम्राज्य के शासक श्री मारा विजयोतुंग वर्मन ने करवाया था.
ताम्र पत्रों की विशेषताएं
इन ताम्रपत्रों में 21 बड़ी और 3 छोटी तांबे की चादरें हैं, जिनका कुल वजन लगभग 30 किलोग्राम है. सभी प्लेटें एक गोलाकार तांबे के छल्ले से बंधी हुई हैं, जिस पर चोल राजवंश की राजकीय मुहर लगी है. इतिहासकारों के अनुसार, मूल अनुदान राजराजा चोल प्रथम के समय दिया गया था, लेकिन इन्हें स्थायी रूप से दर्ज करने का काम उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम ने करवाया.
ऐतिहासिक महत्व
ये अभिलेख सिर्फ सरकारी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि उस युग के दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच घनिष्ठ समुद्री व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और धार्मिक सहिष्णुता की जीवंत गवाही देते हैं. इससे पता चलता है कि हिंदू शासक बौद्ध संस्थाओं को भी संरक्षण और सहयोग देते थे. इतिहासकारों का मानना है कि ये प्लेटें चोल साम्राज्य के स्वर्ण युग की समृद्धि, विस्तार और बहुलवादी परंपरा को उजागर करती हैं. उस दौर में भारतीय विद्वान और बौद्ध भिक्षु दक्षिण-पूर्व एशिया तक नियमित रूप से यात्राएं करते थे.
चोल वंश का संक्षिप्त परिचय
चोल राजवंश की नींव 9वीं शताब्दी में विजयालय चोल ने रखी थी. इस वंश ने तमिल भूमि को कला, वास्तुकला, व्यापार और प्रशासन के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया. राजराजा चोल प्रथम द्वारा बनवाया गया बृहदीश्वर मंदिर आज भी इस काल की वास्तुकला की उत्कृष्ट मिसाल है और यूनेस्को विश्व धरोहर में शामिल है. चोल काल की कांस्य मूर्तियां भी अपनी बारीक कारीगरी के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं.
नीदरलैंड द्वारा इन ताम्रपत्रों की वापसी को औपनिवेशिक काल में विदेश ले जाए गए भारतीय सांस्कृतिक खजाने की वापसी की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. यह भारत और नीदरलैंड के बीच सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों को और मजबूत करने वाला तोहफा साबित होगा.