नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा हाल ही में जारी किए गए नए नियमों पर तत्काल रोक लगा दी है. ये नियम 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने' (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) से जुड़े हैं, जिन्हें 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया था.
कई याचिकाकर्ताओं ने इन नियमों को चुनौती देते हुए कहा कि वे मनमाने, भेदभावपूर्ण हैं और संविधान तथा UGC एक्ट, 1956 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं. उनका मुख्य तर्क था कि ये नियम कुछ खास समूहों को सुरक्षा देते हुए अन्यों को नजरअंदाज कर सकते हैं, जिससे असमानता बढ़ सकती है.
सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान इन नियमों की भाषा को अस्पष्ट बताया. कोर्ट ने कहा कि प्रावधानों में इस्तेमाल शब्दों से ऐसा प्रतीत होता है कि इनका दुरुपयोग आसानी से हो सकता है. जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि जब पहले से ही कुछ प्रावधान (जैसे 3 'E' से जुड़े) मौजूद हैं, तो अतिरिक्त दो 'C' वाले हिस्से की क्या आवश्यकता है? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह समाज में निष्पक्षता और समावेशी माहौल बनाए रखना चाहता है, लेकिन ऐसे नियम नहीं जो विभाजन पैदा करें.
याचिकाकर्ताओं के वकील विष्णु शंकर जैन ने विशेष रूप से UGC एक्ट की धारा 3(C) को असंवैधानिक करार दिया. उन्होंने तर्क दिया कि यह धारा सामान्य श्रेणी के छात्रों पर भेदभाव की धारणा बनाती है. चीफ जस्टिस ने जवाब में कहा कि अदालत सिर्फ इन प्रावधानों की कानूनी और संवैधानिक वैधता की जांच कर रही है.
केंद्र सरकार को नोटिस जारी
कोर्ट ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी किया है. फिलहाल इन नए नियमों को लागू होने से रोक दिया गया है और 2012 के पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे. मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी, जहां कोर्ट यह तय करेगा कि ये नियम वैध हैं या नहीं. यह फैसला उन लोगों के लिए बड़ी राहत है जो इन नियमों से प्रभावित होने की आशंका जता रहे थे. कोर्ट का जोर इस बात पर है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और सुरक्षा सुनिश्चित हो, लेकिन बिना किसी के अधिकारों का हनन किए.