नई दिल्ली: ओपी राजभर के अस्पताल में भर्ती होने के बाद की ये पहली तस्वीर है, जिसमें उनका चेहरा और हाव-भाव स्पष्ट तौर पर नजर आ रहा है. तस्वीर देखकर लगता है उनकी हालत में सुधार है, सीएम योगी उनसे मिलने लखनऊ के मेदांता अस्पताल में पहुंचते हैं, जहां पहले हालचाल लेते हैं, डॉक्टर्स से अपडेट लेते हैं. पता चलता है कि ओपी राजभर का इलाज विशेषज्ञ डॉ. अनूप कुमार ठक्कर और डॉ. राकेश मिश्रा (न्यूरोलॉजी) की देखरेख में चल रहा है. उनकी स्थिति में सुधार है.
राजभर का हाल जानने के बाद योगी फिर अरविंद राजभर के बच्चों को गोद में लिए नजर आते हैं, थोड़ी देर के लिए हॉस्पिटल का माहौल हल्का नजर आता है. पर ये तस्वीर जैसे ही सामने आती है पहला सवाल यही उठता है कि राजभर सरकारी की बजाय प्राइवेट अस्पताल में भर्ती क्यों हुए.
ये तस्वीरें उसी अस्पताल की बताई जा रही है, जबकि दूसरी तस्वीर मेदांता की है, प्राइवेट अस्पताल वाली तस्वीर चकाचक दिख रही है, जबकि सरकारी अस्पताल वाली तस्वीर में चमक कम है, तो क्या सुख-सुविधा सरकारी अस्पताल में ठीक नहीं थी. इन्हें भर्ती करवाने तो खुद स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक गए थे, जो फोन कर अस्पताल के डॉक्टर्स की क्लास लगा देते हैं, रियलिटी चेक के लिए छापा मार देते हैं, फिर उनके सामने ही राम मनोहर लोहिया अस्पताल से राजभर को क्यों जाना पड़ा, क्या लखनऊ के सारे सरकारी अस्पताल नकारा है, ऐसा नहीं है कि लखनऊ में सिर्फ यही एक सरकारी अस्पताल है.
और कितने अस्पताल?
यानि यूपी की राजधानी में सरकारी अस्पताल कई हैं, और यहां व्यवस्थाएं होने के दावे भी किए जाते हैं, लेकिन जब मंत्रीजी बीमार पड़ते हैं, उन्हें माइनर ब्रेन स्ट्रोक होता है, वो चक्कर खाकर बेड पर गिर जाते हैं, तो उन्हें थोड़ी देर के लिए सरकारी अस्पताल में रखा जाता है और बेहतर इलाज के लिए उस प्राइवेट अस्पताल में भेज दिया जाता है, जिस पर पहले फर्जी बिल बनाकर मरीजों को लूटने के आरोप लग चुके हैं. अब मंत्रीजी को पैसे की कमी तो है नहीं, मेदांता चाहे कितने भी लाख का बिल बना दे, जनता के टैक्स के पैसे से राजभर का इलाज हो जाएगा. लेकिन जरा सोचिए जिस लखनऊ से अटल बिहारी वाजपेयी सांसद रहे, राजनाथ सिंह अभी मौजूदा सांसद हैं. जहां मुख्यमंत्री बैठते हैं, मुलायम से लेकर मायावती और अखिलेश तक यूपी के सीएम रहे, अभी योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं, फिर भी क्या लखनऊ में एक भी सरकारी अस्पताल इतना लायक नहीं बन पाया, जो एक मंत्री का इलाज कर सके. या फिर राजभर के परिवार ने कहा हम सरकारी अस्पताल में नहीं रुकना चाहते, क्योंकि रोज सरकारी अस्पताल को लेकर नए खुलासे होते हैं.
जिस दिन राजभर बीमार हुए, उसी दिन सपा ने ट्वीट किया, ''अस्पताल प्रशासन पर डिप्टी सीएम की नाराजगी का भी असर नहीं, मरीजों को घर से तकिया-चादर लाना पड़ रहा. जिला अस्पताल में तीमारदार स्ट्रेचर खींच रहे हैं, सेवादार आराम फरमा रहे हैं, 36 वॉर्ड ब्वॉय पर खर्च होता है 10 लाख महीना''. यहां तक कि प्रेग्नेंट महिलाएं जो अस्पतालों में भर्ती हैं, उन्हें समय पर खाना भी नहीं मिल रहा, आम आदमी की ये हालत रुला देने वाली है, लेकिन ये व्यवस्था बदलेगी कैसे, हर कोई राजभर के जल्द स्वस्थ होने की कामना कर रहा है, पर सरकारी सिस्टम कब स्वस्थ होंगे, ये बड़ा सवाल है.