नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) इन दिनों तीखी आलोचना का सामना कर रहा है. इसका कारण है कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान को 1 अरब डॉलर (लगभग 8400 करोड़ रुपये) की आर्थिक मदद देना. यह मदद शुक्रवार को IMF के एक विशेष कार्यक्रम, एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी (ईएफएफ), के तहत दी गई. इस कार्यक्रम के तहत अब तक पाकिस्तान को कुल 2.1 अरब डॉलर मिलना है. इसके अलावा, IMF ने 1.4 अरब डॉलर की एक और राशि रेजिलिएंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी (आरएसएफ) के तहत मंजूर की, जिसका मकसद कथित तौर पर पाकिस्तान को जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करना है. लेकिन इस फैसले का समय इतना गलत माना जा रहा है कि भारत ही नहीं, बल्कि कई अन्य देशों और विशेषज्ञों ने भी इसकी कड़ी निंदा की है.
इधर पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ने भी बड़ा कदम उठा लिया है और किसी भी आतंकी हमले को वार ऑफ एक्ट करार दिया है, क्योंकि विशेषज्ञ मान रहे हैं कि पाकिस्तान इन पैसों का इस्तेमाल छद्म युद्ध यानी भारत पर आतंकी हमले के लिए कर सकता है. और आगर पाकिस्तान भारत में आतंकवादी भेजेगा हिंदुस्तान भी युद्ध मान कर करारा जवाब देगा. भारत की ओर से यह फैसला पीएम मोदी की हाईलेवल मीटिंग के बाद लिया गया है.
भारत का विरोध और नैतिक सवाल
पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले ने भारत को झकझोर कर रख दिया था. इसके बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए आतंकवादी ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की. ऐसे में IMF का यह कदम कई सवाल खड़े करता है. भारत ने IMF की कार्यकारी बोर्ड की बैठक में वोटिंग से खुद को अलग रखा, यानी उसने न तो समर्थन दिया और न ही विरोध का कोई औपचारिक तरीका अपनाया, क्योंकि IMF में 'ना' वोट देने का प्रावधान ही नहीं है. देश या तो पक्ष में वोट दे सकते हैं या वोटिंग से दूर रह सकते हैं. भारत ने वोटिंग से दूरी बनाकर अपनी नाराजगी जाहिर की और एक बयान जारी कर कहा कि IMF की प्रक्रियाओं में "नैतिक सुरक्षा" की कमी है.
भारत के वित्त मंत्रालय ने चेतावनी दी कि IMF जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों से मिलने वाली राशि का दुरुपयोग हो सकता है. यह पैसा सैन्य गतिविधियों या आतंकवादी संगठनों तक पहुंच सकता है. मंत्रालय ने यह भी कहा कि भारत की इस चिंता को कई अन्य देशों ने भी साझा किया, जिससे साफ होता है कि वैश्विक समुदाय में भी इस फैसले को लेकर असहजता है.
क्यों हो रही है आलोचना?
भारत के कूटनीतिज्ञों और विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय IMF का यह फैसला गलत संदेश देता है. पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इसे "बेहद खराब कदम" बताया. उन्होंने कहा कि IMF का प्रशासन पश्चिमी देशों के पक्ष में झुका हुआ है और इसमें जवाबदेही की कमी है. वहीं, मशहूर विश्लेषक यशवंत देशमुख ने कड़े शब्दों में कहा कि "IMF के हाथ खून से सने हैं."
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सुशांत सरीन ने कहा कि यह मदद पाकिस्तान के सैन्य तंत्र को और मजबूत करेगी, न कि उसे सुधार की दिशा में ले जाएगी. भारत का लंबे समय से यह आरोप रहा है कि पाकिस्तान को मिलने वाली IMF की मदद का गलत इस्तेमाल होता है. पिछले 35 सालों में पाकिस्तान 28 बार IMF के कार्यक्रमों में शामिल हो चुका है, जिनमें से चार सिर्फ पिछले पांच साल में हुए हैं. फिर भी, न तो उसकी अर्थव्यवस्था में स्थिरता आई और न ही कोई बड़े सुधार दिखे. जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी सवाल उठाया कि जब IMF पाकिस्तान को ऐसी मदद दे रहा है, तो तनाव कम करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? उन्होंने कहा कि यह मदद पाकिस्तान को भारतीय शहरों पर हमलों के लिए "पुरस्कृत" करने जैसा है.
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
आलोचना सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है. निर्वासित अफगान सांसद मरियम सोलैमानखिल ने सोशल मीडिया पर लिखा, "IMF ने अर्थव्यवस्था को नहीं बचाया, उसने खूनखराबे को बढ़ावा दिया." उन्होंने सवाल किया कि दुनिया कब तक पाकिस्तान को हत्याओं के लिए पैसा देती रहेगी? यह बयान दर्शाता है कि क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर भी लोग इस फैसले से नाराज हैं.
क्या है असली चिंता?
IMF का कहना है कि यह मदद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को स्थिर करने और जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए है. लेकिन भारत और अन्य आलोचकों का मानना है कि इस पैसे का इस्तेमाल आतंकवाद या सैन्य गतिविधियों में हो सकता है, क्योंकि पाकिस्तान की सरकार और सेना का आतंकवादी संगठनों से पुराना रिश्ता रहा है. खासकर ऐसे समय में, जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर है, यह मदद शांति की कोशिशों को कमजोर कर सकती है. भारत ने साफ कर दिया है कि वह इस मदद को गलत मानता है और चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय संगठन अपनी नीतियों में सुधार करें.