पटना: पटना हाईकोर्ट ने बिहार के सिवान में 300 भक्तों की वार्षिक धार्मिक शोभायात्रा की अनुमति मांगने वाली याचिका खारिज कर दी है. कोर्ट ने साफ कहा कि धर्म की स्वतंत्रता संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह निरपेक्ष नहीं है. सार्वजनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखना इससे ऊपर है.
जस्टिस आलोक कुमार की बेंच ने 20 अगस्त को दिए फैसले में कहा कि आर्टिकल 25 और आर्टिकल 19(1)(बी) के तहत धार्मिक जुलूस निकालने का अधिकार सुरक्षित है, लेकिन इसे सार्वजनिक शांति, नैतिकता और स्वास्थ्य की जरूरतों के साथ संतुलित करना जरूरी है. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता असीमित नहीं हो सकती और इसे दूसरों के अधिकारों तथा सामाजिक मानदंडों के साथ मिलाना पड़ता है.
याचिका में क्या मांगा गया था?
याचिकाकर्ता ने स्थानीय अखाड़े की ओर से भाद्रपद कृष्ण पक्ष की 11वीं तिथि पर निकलने वाली पारंपरिक शोभायात्रा को कम से कम 300 भक्तों के साथ पुराने रूट पर निकालने की अनुमति मांगी थी. याचिका में दावा किया गया कि 2012-13 में 200, 2014 में 150, 2015 में 100 और 2023 के बाद सिर्फ 5 भक्तों की अनुमति दी जा रही है. पारंपरिक रूट में बदलाव पर भी आपत्ति जताई गई थी. याचिकाकर्ता का कहना था कि ये प्रतिबंध आर्टिकल 25 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हैं और पुराने रूट पर कभी शांति भंग की शिकायत नहीं हुई.
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि ये प्रतिबंध कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा उपाय हैं. हालांकि अनुमति सिर्फ 5 की थी, लेकिन 2015 से 2022 तक असल में 1700 से 2000 लोग शामिल होते रहे. 2024 की शोभायात्रा के दौरान भीड़ ने ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर की सरकारी गाड़ी में आग लगा दी और पुलिसकर्मियों पर पथराव किया. सरकार ने इसे भेदभावपूर्ण नहीं, बल्कि पुलिस वेरिफिकेशन पर आधारित सुरक्षा उपाय बताया.
जस्टिस आलोक कुमार ने कहा, “जहां एक ओर धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता जरूरी है, वहीं आवासीय इलाकों में सार्वजनिक शांति बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है.” कोर्ट ने यह भी साफ किया कि भविष्य में भक्तों की संख्या पर और प्रतिबंध लगने की आशंका काल्पनिक है. ऐसे प्रतिबंध उस समय की कानून-व्यवस्था की स्थिति पर निर्भर करेंगे, जब अनुमति मांगी जाएगी. अंत में कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए दोहराया कि धार्मिक स्वतंत्रता सुरक्षित है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था के हित में उस पर उचित पाबंदियां लगाई जा सकती हैं.