नई दिल्ली: अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं. अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इसे ‘इकोनॉमिक डी-डे’ करार दिया है. भले ही भारत सीधे ईरान से कच्चा तेल न खरीदता हो, लेकिन ग्लोबल एनर्जी मार्केट के जरिए इसका असर भारत पर पड़ सकता है.
2019 के बाद से भारत ईरान से तेल आयात बंद कर चुका है. इसलिए प्रत्यक्ष प्रभाव नगण्य है. असली खतरा ‘चीन फैक्टर’ से है. चीन हर महीने ईरान से 5 से 8 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीदता है. अगर प्रतिबंधों के दबाव में चीन दूसरे बाजारों का रुख करता है, तो वह उन सप्लाई पर कब्जा करने की कोशिश करेगा जिन पर भारत निर्भर है. इससे अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के दाम उछल सकते हैं.
भारत अपनी जरूरत का करीब 50% कच्चा तेल (25-28 लाख बैरल प्रतिदिन) रूस से खरीद रहा है. लेकिन रूसी तेल पर मिलने वाली छूट कम हो रही है और प्रीमियम बढ़ रहा है. इससे भारतीय रिफाइनरियों का खर्च बढ़ेगा. मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण शिपिंग फ्रेट 137% से 411% तक बढ़ चुका है.
होर्मुज रूट पर वॉर-रिस्क इंश्योरेंस भी आसमान छू रहा है. कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ने से चालू खाता घाटा बढ़ेगा और रुपये पर दबाव पड़ेगा. पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस समेत रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं. कुल मिलाकर, यह ‘सेकंड-ऑर्डर इफेक्ट’ के रूप में भारत की महंगाई और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है.