नई दिल्ली: राहुल गांधी बंगाल की घटना पर तो चुप हैं, लेकिन 8 महीने बीत चुके महाराष्ट्र चुनाव के मुद्दे को अमेरिका में जाकर उठाते हैं, बोस्टन की ब्राउन यूनिवर्सिटी से ये राग छेड़कर ये साबित कर देते हैं कि जब-जब वो विदेशी दौरे पर जाते हैं भारत का एक बार अपमान तय है. और इस बार राहुल ने जो कहा है, उसे तीन प्वाइंट में जरा पहले समझिए, फिर इस बात पर आते हैं कि राहुल की ये सोची-समझी प्लानिंग है, या विदेशी टूलकिट का खेल है, बोस्टन वो जगह है, जहां से अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम ने रफ्तार पकड़ा था, आपने पढ़ा होगा, वहां के बंदरगाहों पर पहुंची जहाज में भरी ईस्ट इंडिया कंपनी की चाय की पेटियां आंदोलनकारियों ने समुद्र में फेंक दी थी, ये चाय पर कर लगाए जाने का विरोध था, और अब राहुल वहां जाकर चुनाव आयोग के खिलाफ ऐसी-ऐसी बातें कर रहे हैं, तो क्या लौटने के बाद कोई बड़ी प्लानिंग में हैं, या फिर हर बार की तरह ये इनका बेवजह का राग है, इसे भी समझना होगा. ब्राउन यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट से बातचीत के दौरान राहुल तीन बातें कहते हैं.
पहला- मैं कई बार कह चुका हूं कि महाराष्ट्र में जितने बालिग नहीं हैं, उससे ज्यादा वोटिंग हुई। चुनाव आयोग ने हमें साढ़े पांच बजे वोटिेंग का आंकड़ा बताया। इसके बाद 5:30 से शाम 7:30 के बीच 65 लाख वोटिंग हुई।
दूसरा- 2 घंटे में 65 लाख वोटिंग नामुमकिन है। एक वोटर को वोट डालने में करीब 3 मिनट लगते हैं। अगर आप गणित लगाएंगे तो पता चलेगा कि रात 2 बजे तक वोटर्स की लाइन लगनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
तीसरा- हमने चुनाव की वीडियोग्राफी मांगी तो आयोग ने साफ मना कर दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने कानून भी बदल दिया, ताकि हम आगे वीडियो के बारे में सवाल न कर सकें।
जिसका कोई जवाब चुनाव आयोग देता उससे पहले ही बीजेपी नेता संबित पात्रा ने कहा विदेशी धरती पर देश का अपमान राहुल की पुरानी आदत है, ये सवाल राहुल ने फरवरी महीने में भी उठाया, तब चुनाव आयोग ने कहा था निष्पक्ष चुनाव हुए हैं, आरोप बेबुनियाद हैं, यहां तक कि ईवीएम में गड़बड़ी के आरोपों पर चुनाव आयोग सारी पार्टियों को बुला भी चुका है कि आइए और गड़बड़ी चेक करके डेमो दिखाइए, लेकिन उस वक्त कोई नहीं जाता, जब चुनाव में हार होती है विपक्ष सवाल उठाता है, जीतने के बाद चुप हो जाता है, तो क्या ये रोना सिर्फ इसलिए क्योंकि कांग्रेस को सत्ता नहीं मिल रही, और इस बार बहुमत की सरकार नहीं है, इसलिए मोदी सरकार को हर मोर्चे पर घेरने की कोशिश की जा रही है, विदेशी धरती से बोलकर नया दबाव बनाने की प्लानिंग रची जा रही है, 7 महीने में राहुल की ये दूसरी अमेरिकी यात्रा है, उस वक्त उन्होंने कहा था सबकुछ मेड इन चाइना है इसलिए भारत में रोजगार की दिक्कत है, लेकिन जिन राज्यों में कांग्रेस या इंडिया गठबंधन की सरकार है, वहां रोजगार की क्या हालत है, जरा अंदाजा लगा लीजिए. राहुल गांधी देश में एक ऐसा नैरेटिव सेट करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे लगे कि यहां लोकतंत्र नहीं बचा, तानाशाही चल रही है.
अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की सरकार है, ट्रंप ने कुछ दिनों पहले भारतीयों को हथकड़ी लगाकर भेजा, जिस पर खूब हंगामा मचा, अगर राहुल उस मुद्दे पर वहां जाकर कुछ कहते तो शायद बात कुछ और होती, पर राहुल देश की संस्थाओं पर गलत आरोप लगाकर अपने देश का अपमान करने से नहीं चूक रहे हैं. शायद कांग्रेस को ये लग रहा है कि जैसे नेहरू बात-बात पर विदेश दौड़ते थे, वैसे ही मोदी को करना चाहिए, लेकिन भारत जब संप्रभु राष्ट्र है तो फिर ऐसा क्यों करना भाई, राहुल के पास नेता प्रतिपक्ष जैसा भारी भरकम पद है, उन्हें जनता से जुड़े मुद्दों पर सवाल पूछना चाहिए, लेकिन इस मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए कि देश के अपमान का टैग न लगे, क्योंकि जिस आदमी पर भारत के अपमान का टैग लगे उसे लोग देश का प्रधानमंत्री कैसे चुनेंगे.
क्या राहुल गांधी को ये नहीं पता कि मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री हुआ करते थे, और नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो पाकिस्तान के पीएम ने मनमोहन पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, और मोदी ने उसका जवाब सियासत से ऊपर उठकर दिया था, कहा था राजनीति बाद में देश पहले, वो हमारे देश के पीएम हैं, उनके बारे में कोई ऐसा कैसे बोल सकता है.. क्या राहुल कभी ये अंदाज अपने अंदर ला पाएंगे, बंगाल की घटना पर ममता बनर्जी को ये कह पाएंगे कि गलत हो रहा है, हालात सुधारिए, या फिर मुस्लिम वोटबैंक की खातिर अपने पूर्वजों की तरह चुप रहेंगे.