Ayodhya Ram Mandir Case : अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा कथित गड़बड़ी मामले में गिरफ्तार आरोपियों का मुकदमा लड़ने से अयोध्या के वकीलों द्वारा इनकार किए जाने के बाद कानूनी बहस तेज हो गई है. हालांकि, संवैधानिक व्यवस्था और न्यायिक परंपरा के अनुसार किसी भी आरोपी को कानूनी सहायता से वंचित नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत का कहना है कि यदि निजी वकील मुकदमा लड़ने से इनकार करते हैं, तब भी अदालत यह सुनिश्चित करती है कि आरोपी को कानूनी प्रतिनिधित्व मिले, क्योंकि निष्पक्ष सुनवाई हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है.
देश में इससे पहले भी कई चर्चित मामलों में ऐसी स्थिति सामने आ चुकी है. वर्ष 2012 के निर्भया गैंगरेप मामले, हैदराबाद पशु चिकित्सक दुष्कर्म एवं हत्या प्रकरण, कठुआ रेप केस, संसद हमले के दोषी अफजल गुरु और 26/11 मुंबई हमले के आरोपी अजमल कसाब के मामलों में भी कई वकीलों ने पैरवी से इनकार किया था, इसके बावजूद न्यायिक प्रक्रिया के तहत आरोपियों को लीगल एड या अन्य माध्यमों से वकील उपलब्ध कराए गए, ताकि निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो सके.
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(1) प्रत्येक आरोपी को अपनी पसंद के वकील के माध्यम से बचाव का अधिकार देता है. वहीं, अनुच्छेद 14 सभी के लिए कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है और अनुच्छेद 39A आर्थिक या अन्य कारणों से न्याय से वंचित न होने देने तथा मुफ्त कानूनी सहायता की व्यवस्था का निर्देश देता है.
सुप्रीम कोर्ट ने ए.एस. मोहम्मद रफी बनाम तमिलनाडु मामले में स्पष्ट किया था कि बार एसोसिएशन द्वारा किसी आरोपी का मुकदमा न लड़ने संबंधी सामूहिक प्रस्ताव असंवैधानिक और पेशेवर आचार संहिता के विपरीत हैं. अदालत ने कहा था कि अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, प्रत्येक आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी बचाव का अधिकार प्राप्त है। इसी सिद्धांत के आधार पर अदालतें आवश्यकता पड़ने पर आरोपी के लिए वकील नियुक्त करती हैं, ताकि न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष और संविधान के अनुरूप बनी रहे.