लखनऊ : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बीजेपी के भीतर टिकटों को लेकर बड़ा मंथन शुरू हो गया है. पार्टी के इंटरनल सर्वे में पूर्वांचल के कई मौजूदा विधायकों को लेकर जनता और स्थानीय संगठन में नाराजगी सामने आने की बात कही जा रही है. सूत्रों के मुताबिक, पूर्वांचल में करीब 75 फीसदी मौजूदा बीजेपी विधायकों के टिकट पर कैंची चल सकती है. पार्टी इस बार चेहरे बदलकर एंटी-इनकंबेंसी को खत्म करने की रणनीति पर काम कर रही है. पूर्वांचल बीजेपी के लिए बेहद अहम है.
वाराणसी, चंदौली, मिर्जापुर, सोनभद्र, भदोही, गाजीपुर, जौनपुर, आजमगढ़, मऊ, बलिया, देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर, महाराजगंज, बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर, अयोध्या, सुल्तानपुर, अमेठी, प्रतापगढ़, कौशांबी, अंबेडकरनगर, गोंडा, बहराइच और बलरामपुर जैसे जिलों में टिकट बदलने का असर सीधे चुनावी गणित पर पड़ सकता है.
सर्वे में जिन विधायकों को लेकर लगातार शिकायतें मिली हैं, उनमें जनता से दूरी, क्षेत्र में विकास कार्यों को लेकर असंतोष, कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, संगठन में गुटबाजी और स्थानीय स्तर पर पकड़ कमजोर होने जैसे मुद्दे प्रमुख बताए जा रहे हैं. बीजेपी ऐसे चेहरों की जगह संगठन से जुड़े नए नेताओं, मजबूत सामाजिक समीकरण वाले उम्मीदवारों और जमीनी पकड़ रखने वाले चेहरों को मौका देने की तैयारी में है.
सीटों के गणित की बात करें तो पूर्वांचल की करीब 160 विधानसभा सीटों को बीजेपी अपने लिए सबसे बड़ा टारगेट मान रही है. अंदरूनी रणनीति के मुताबिक पार्टी 75 से 85 सीटों तक पहुंचने का लक्ष्य रख सकती है. वाराणसी- मिर्जापुर बेल्ट में करीब 15 सीट, गोरखपुर-बस्ती क्षेत्र में 20 के आसपास, जबकि गाजीपुर-आजमगढ़-मऊ-बलिया बेल्ट में 10-12 सीटों पर बढ़त बनाने की कोशिश होगी.
यानी 2027 में बीजेपी का फॉर्मूला साफ है कि पुराने चेहरों पर भरोसा कम, नए चेहरों पर दांव ज्यादा. अगर इंटरनल सर्वे के संकेत टिकट वितरण तक पहुंचे तो पूर्वांचल में बीजेपी की पूरी चुनावी टीम का चेहरा बदल सकता है.
प्रयागराज : उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक दौर ऐसा था जब रीता बहुगुणा जोशी का नाम कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक बेहद प्रभावशाली चेहरों में गिना जाता था. प्रयागराज की राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ थी. लखनऊ कैंट से विधायक रहीं. यूपी कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं और 2019 में बीजेपी के टिकट पर प्रयागराज से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं, लेकिन आज सवाल यही है आखिर रीता बहुगुणा जोशी राजनीतिक मंच से इतनी कम क्यों नजर आ रही हैं.
इस कहानी का बड़ा मोड़ 2024 का लोकसभा चुनाव रहा. बीजेपी ने प्रयागराज से मौजूदा सांसद रीता बहुगुणा जोशी का टिकट काट दिया. उनकी जगह नीरज त्रिपाठी को मैदान में उतारा गया. यानी जिस सीट से रीता ने 2019 में जीत दर्ज की थी, 2024 में पार्टी ने वहां नेतृत्व का चेहरा बदल दिया.
रीता की राजनीति में दूरी की कहानी सिर्फ टिकट कटने तक सीमित नहीं है, इससे पहले भी बीजेपी के भीतर टिकट को लेकर उनकी नाराजगी चर्चा में आ चुकी थी. 2022 में लखनऊ कैंट सीट से अपने बेटे मयंक जोशी के लिए टिकट मांगते हुए उन्होंने यहां तक कहा था कि अगर बेटे को टिकट मिलता है तो वह सांसद पद छोड़ने को तैयार हैं. यह बयान पार्टी की एक परिवार, एक टिकट नीति के बीच बड़ी राजनीतिक चर्चा बना था.
यहीं से सवाल उठता है कि क्या रीता बहुगुणा जोशी और बीजेपी नेतृत्व के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ी. एक तरफ पार्टी लगातार नई पीढ़ी के नेताओं को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम करती दिखी, दूसरी तरफ रीता बहुगुणा जोशी जैसे पुराने और बड़े राजनीतिक चेहरे धीरे-धीरे चुनावी फ्रंटलाइन से बाहर होते गए. 2024 में प्रयागराज का टिकट कटना इसी बदलाव का सबसे बड़ा संकेत माना गया.
रीता की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह सिर्फ बीजेपी की नेता नहीं रहीं. कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष से लेकर बीजेपी सांसद तक उनका लंबा राजनीतिक सफर रहा है. 2016 में बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने तेजी से पार्टी में अपनी जगह बनाई और 2019 में प्रयागराज से सांसद बनीं.
अब 2026 में तस्वीर बदली हुई है. उनके पति पीसी जोशी के निधन की खबर भी सामने आई, जिसके बाद स्वाभाविक रूप से उनका सार्वजनिक राजनीतिक सक्रियता का स्तर प्रभावित हो सकता है. इसलिए रीता बहुगुणा गायब हैं. कहना शायद जल्दबाजी होगी. असली कहानी यह है कि यूपी बीजेपी की राजनीति में उनका वह चुनावी और संगठनात्मक वजन अब पहले जैसा दिखाई नहीं देता.