सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पटना हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़े वर्गों, अत्यंत पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण बढ़ाने के राज्य सरकार के संशोधनों को रद्द कर दिया गया था. मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने मामले को विस्तृत सुनवाई के लिए सितंबर के लिए सूचीबद्ध किया. पीठ में सीजेआई के अलावा, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और मनोज मिश्रा शामिल थे.
इस बीच शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह पटना हाईकोर्ट के फैसले पर रोक नहीं लगा रही है. बिहार सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने शीर्ष अदालत से पटना हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने का अनुरोध किया और छत्तीसगढ़ के एक ऐसे ही मामले का उल्लेख किया, जिसमें शीर्ष अदालत ने उस मामले में संबंधित हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी. लेकिन शीर्ष अदालत ने पटना उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने के लिए आश्वस्त नहीं किया.
बिहार सरकार ने अधिवक्ता राज्य के स्थायी वकील मनीष कुमार के माध्यम से अपील दायर की थी. वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने प्रतिवादी यूथ फॉर इक्वालिटी का प्रतिनिधित्व किया. अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग महासंघ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वी ईश्वरैया, अधिवक्ता राजन राज और अधिवक्ता मोहिनी प्रिया मामले में पेश हुए.
बता दें कि पटना उच्च न्यायालय ने जून में बिहार पदों और सेवाओं में रिक्तियों का आरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2023 और बिहार (शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में) आरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2023 को अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत समानता के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाला और अधिकारहीन बताते हुए रद्द कर दिया था. बिहार विधानमंडल ने 2023 में दोनों अधिनियमों में संशोधन किया था और नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत कर दिया था.
राज्य में जाति सर्वेक्षण के निष्कर्षों के आधार पर, राज्य सरकार ने अनुसूचित जाति के लिए कोटा बढ़ाकर 20 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए दो प्रतिशत, अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए 25 प्रतिशत और पिछड़ा वर्ग के लिए 18 प्रतिशत कर दिया. गौरतलब है कि उस समय नीतीश कुमार की जनता दल-यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस पार्टी वाले महागठबंधन का हिस्सा थी.