लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद 4 जून को नतीजा आया था. वहीं नतीजों में बीजेपी बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पाई थी तो विपक्ष ने सरकार बनाने के सपने सजाना शुरू कर दिया था. हालांकि विपक्ष का सपना टूट गया और देश में NDA की सरकार बन गई, लेकिन अब एक बार फिर विपक्ष वही सपना सजा रहा है. क्योंकि सरकार गठन के बाद लोकसभा स्पीकर के पद पर खींचतान की ख़बरें आने लगी हैं.
इस बीच लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव से पहले विपक्ष बार बार इस बात पर जोर दे रहा है कि NDA के सहयोगियों के पास लोकसभा अध्यक्ष का पद होना चाहिए. ऐसे में सवाल ये है कि आखिर विपक्ष इस मुद्दे पर इतना क्यों अड़ा है? उसे क्या फायदा हो सकता है? विपक्ष क्यों चाहता है कि स्पीकर का पद सहयोगियों के पास जाए? इसकी मुख्यतः दो वजह हो सकती हैं.
पहला- सरकार सदन में फ्री हेंड काम न कर सके इसके लिए जरुरी है कि अध्यक्ष उसकी पार्टी का न हो. इसलिए विपक्ष चाहता है कि ये पद सहयोगी को मिले.
दूसरा- अगर स्पीकर पद पर बीजेपी और सहयोगियों में सहमति नहीं बनती है तो NDA गठबंधन टूट सकता है और अगर ऐसा हुआ तो फायदा विपक्ष को ही होगा.
इतिहास में अभी तक जब भी गठबंधन की सरकार बनी है स्पीकर दूसरे दलों से रहा है. इसी का हवाला देकर विपक्ष कह रहा है कि स्पीकर सहयोगी दल से होना चाहिए, जबकि 2009 में जब कांग्रेस के पास कुल 206 सीटें थीं लेकिन स्पीकर कांग्रेस की मीरा कुमारी को चुना गया था. UPA के अन्य दलों ने स्पीकर पद के लिए मीरा कुमार के नाम पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी.
अब बीजेपी भी उसी इतिहास को दोहराना चाहती है जबकि विपक्ष ऐसा नहीं चाहता, क्योंकि इसके पहले 1996, 1998, 1999 में सत्तारूढ़ पार्टी से बाहर का ही स्पीकर रहा. 2004 में सोम नाथ चटर्जी स्पीकर थे, जो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से थे. 1996 में पीए संगमा स्पीकर थे, जो कांग्रेस से लोकसभा में थे. संयुक्त मोर्चा की देवगौड़ा और उनके बाद की इंद्र गुजराल की सरकार को कांग्रेस बाहर से सपोर्ट कर रही थी. इसलिए कांग्रेस ने स्पीकर का पद अपने पास रखा. साल 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की NDA सरकार में स्पीकर तेलुगू देशम के जीएमसी बालयोगी थे.
अब सवाल ये है कि आखिर स्पीकर पद में ऐसा क्या खास है? तो आपको बता दें कि स्पीकर का पद PM पर कंट्रोल की कुंजी कहा जाता है. इसलिए यह पद पीएम के लिए गले की फांस बना हुआ है. अगर वो TDP के दबाव में आते हैं तो उनका पूरा कार्यकाल सांसत में रहेगा. उनको अपने हर फैसले में उसकी भी सहमति लेनी पड़ेगी. जाति जनगणना से लेकर मुस्लिम आरक्षण पर रोक लगाने के उनके इरादे तो खत्म होंगे ही. साथ ही नागरिकता कानून के मुद्दे को भी ठंडे बस्ते में डालना पड़ेगा. लोकसभा अध्यक्ष की शक्तियों की बात करें तो स्पीकर पूरे सदन का प्रतिनिधित्व करता है.
अध्यक्ष के कामकाज पर कोई दखल नहीं कर सकता. अध्यक्ष ही लोकसभा की पूरी शक्ति रखता है. अध्यक्ष निष्पक्ष और पूरी स्वतंत्रता उसके पास होती है. अध्यक्ष को हटाया जा सकता है पर तभी जब सदन की कुल संख्या के आधे से ज्यादा सदस्यों की सहमति हो.
संविधान के अनुच्छेद 100 के अनुसार, अध्यक्ष किसी भी मामले पर मतदान में अपना वोट नहीं देता है. अगर मतदान के दौरान मत बराबर हो जाता है तो अध्यक्ष अपना मत दे सकता है. अध्यक्ष की ताकत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1999 में अध्यक्ष के एक फैसले के चलते अटल बिहारी वाजपेयी सरकार मात्र एक वोट से गिर गई थी.
ऐसे और भी कई मौके रहे हैं इसलिए विपक्ष चाहता है कि अध्यक्ष पद बीजेपी को न मिले. स्पीकर पद सहयोगी को मिले और डिप्टी स्पीकर पर विपक्ष बैठे. यानी विपक्ष बीजेपी के हाथ से सारा कंट्रोल लेना चाहता है. इसके अलावा विपक्षी खेमा लोकसभा में मजबूत स्थिति में है. ऐसे में उसे उम्मीद है कि डिप्टी स्पीकर पद विपक्ष के किसी सांसद को मिलेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि डिप्टी स्पीकर का पद विपक्ष को देने की परम्परा रही है.
16वीं लोकसभा में NDA में शामिल रहे अन्नाद्रमुक के थंबीदुरई को यह पद दिया गया था. जबकि, 17वीं लोकसभा में किसी को भी डिप्टी स्पीकर नहीं बनाया गया था. हालांकि बीजेपी स्पीक पद अपनी पार्टी और डिप्टी स्पीकर पद गठबंधन के दल को देने के मूड में हैं.
चलिए अब ये भी जान लेते हैं कि भारत में लोकतंत्र प्रणाली कैसी है? तो आपको बता दें कि भारत में लोकतंत्र की जो प्रणाली है उसे वेस्टमिंस्टर मॉडल कहा जाता है. इसके लिए लोकसभा में एक पीठासीन अधिकारी होता है, जो स्पीकर कहलाता है. राज्यसभा का सभापति उप राष्ट्रपति होता है. दोनों ही पीठासीन अधिकारियों के साथ एक-एक डिप्टी भी रहता है. लेकिन वो काम तभी करते हैं जब अध्यक्ष अनुपस्थित हों.
कुल मिलकर कहा जाए तो विपक्ष किसी भी सूरत में बीजेपी को मजबूत स्थिति में नहीं रहने देना चाहता. हालांकि नीतीश और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी का कहना है कि सभी दलों की सहमति से उम्मीदवार का चयन होगा. यानी विपक्ष के सपने पूरे होते नहीं दिख रहे हैं. लेकिन ये राजनीति है इसमें कब क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता. जानकार कह रहे हैं कि बीजेपी इस मुश्किल की कोई न कोई काट जरूर निकाल लेगी.