SIR पर चुनाव आयोग को झटका, मानना होगा आधार कार्ड, 65 लाख लोगों के नाम पब्लिश करने का आदेश

Amanat Ansari 14 Aug 2025 05:17: PM 1 Mins
SIR पर चुनाव आयोग को झटका, मानना होगा आधार कार्ड, 65 लाख लोगों के नाम पब्लिश करने का आदेश

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयोग को बिहार में विशेष मतदाता सूची संशोधन (SIR) के दौरान हटाए गए 65 लाख मतदाताओं की जानकारी सार्वजनिक करने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि इस पारदर्शिता से लोग अपनी शिकायतें या सुधार के लिए आवेदन कर सकेंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा?

  • चुनाव आयोग को हर पंचायत और ब्लॉक विकास कार्यालय में हटाए गए मतदाताओं की बूथ-वार सूची, हटाने के कारणों के साथ, प्रिंट करके प्रदर्शित करनी होगी.
  • जिला-स्तर की सूची मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में उपलब्ध होनी चाहिए.
  • इस डेटा को मंगलवार तक चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करना होगा.
  • जिला निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर अपलोड होने वाली सूची की सॉफ्ट कॉपी सर्च करने योग्य होगी.
  • हटाए गए मतदाताओं और कारणों की जानकारी अखबारों, रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से प्रचारित करनी होगी.
  • कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि आधार कार्ड को पहचान के लिए स्वीकार्य दस्तावेज माना जाए.
  • जस्टिस जोयमाला बागची ने कहा, "आपके 11 दस्तावेजों की सूची नागरिकों के लिए सुविधाजनक है, लेकिन आधार और मतदाता पहचान पत्र (EPIC) आसानी से उपलब्ध हैं. आप अपने नोटिस में कह सकते हैं कि जिन्होंने अभी तक दस्तावेज जमा नहीं किए, वे आधार और EPIC भी जमा कर सकते हैं."

29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि अगर मतदाताओं को बड़े पैमाने पर हटाया गया, तो वह तुरंत हस्तक्षेप करेगा. ड्राफ्ट मतदाता सूची 1 अगस्त को प्रकाशित हुई थी, और अंतिम सूची 30 सितंबर को जारी होगी. विपक्षी दलों का दावा है कि इस प्रक्रिया से लाखों पात्र मतदाताओं के अधिकार छिन सकते हैं.

विवाद बढ़ने पर कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को ऐसी प्रक्रिया करने का अधिकार है, जैसा वह उचित समझे. कोर्ट ने यह भी खारिज कर दिया कि बिहार में SIR का कोई कानूनी आधार नहीं है और इसे रद्द करना चाहिए. यह याचिका RJD, तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस, NCP (शरद पवार), CPI, SP, शिवसेना (उद्धव ठाकरे), JMM, CPI (ML), PUCL, ADR और कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने संयुक्त रूप से दायर की थी, जिसमें 24 जून के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी गई थी.

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