नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को हरियाणा पुलिस (Haryana Police) और एक न्यायिक मजिस्ट्रेट को एक 4 वर्षीय बच्ची के बलात्कार मामले में उनकी संवेदनहीन और लापरवाह कार्यशैली पर जमकर फटकार लगाई. कोर्ट ने जांच और बच्ची के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया में गंभीर खामियों पर गहरी नाराजगी जताई.
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा, ''पुलिस कितनी असंवेदनशील हो गई है? एक तथाकथित महानगर में यह हो रहा है! आप एक ट्रॉमाटाइज्ड बच्ची से निपट रहे हो.'' कोर्ट ने यह भी शॉकिंग बताया कि पुलिस ने कथित तौर पर बच्ची के माता-पिता से पूछा कि वे केस कैसे आगे बढ़ाना चाहते हैं.
बेंच ने टिप्पणी की, ''क्या FIR दर्ज करना उनका कर्तव्य नहीं है? क्या उन्हें कानून की बेसिक बातें भी नहीं पता?'' मुख्य न्यायाधीश ने मजिस्ट्रेट द्वारा बच्ची का बयान दर्ज करने के तरीके पर भी गंभीर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि आरोपी बच्ची के बहुत करीब खड़ा था, जो कानूनी सुरक्षा प्रावधानों का साफ-साफ उल्लंघन है.
मुकुल रोहतगी ने प्रक्रिया की गंभीर खामियां बताईं
पीड़िता के माता-पिता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने लाइव लॉ के हवाले से कोर्ट को बताया कि जांच अधिकारी परिवार पर FIR वापस लेने का दबाव डाल रहा था. उन्होंने बच्ची के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए. रोहतगी ने कहा, ''मजिस्ट्रेट लड़की से कह रहा है ओथ तो इसको समझ नहीं आएगा… लेकिन मजिस्ट्रेट लड़की से बार-बार कह रहा है सच बोलो, सच बोलो और आरोपी वहां मौजूद था. आरोपी बच्ची के इतने करीब नहीं हो सकता.
रोहतगी ने यह भी आरोप लगाया कि जांच करने वाली महिला अधिकारी माता-पिता से केस वापस लेने को कह रही थी और पहले एक अन्य POCSO मामले में रिश्वतखोरी के आरोप में निलंबित हो चुकी है. उन्होंने बताया कि बच्ची को लगातार कई दिनों तक पुलिस स्टेशन, चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के दफ्तर, मजिस्ट्रेट कोर्ट और अस्पताल के बीच घुमाया गया.
रोहतगी ने कहा कि हमने घर पर बयान दर्ज करने का अनुरोध किया तो SI ने चिढ़कर कहा कि हम मुश्किल पैदा कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया ने बच्ची के ट्रॉमा को और बढ़ाया. रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में ट्रायल से पहले की प्रक्रियाओं के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाएं ताकि पीड़ित बच्ची के साथ सम्मान और देखभाल से पेश आया जा सके.
पुलिस और मजिस्ट्रेट को दिए गए निर्देश
आरोपों पर गंभीरता से संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर और जांच अधिकारी को बुधवार को पूरा केस रिकॉर्ड लेकर कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया. कोर्ट ने हरियाणा सरकार से यह भी पूछा कि उनके पुलिस कैडर में कितनी महिला पुलिस अधिकारी हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि कोर्ट नाबालिग मामलों में महिला अधिकारियों की भूमिका को लेकर चिंतित है.
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें गुरुग्राम पुलिस की बजाय CBI या SIT से जांच कराने की मांग की गई है. कोर्ट ने पुलिस को विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया. इसके अलावा, कोर्ट ने गुरुग्राम सेशंस कोर्ट को निर्देश दिया कि बच्ची का बयान दर्ज करने वाली न्यायिक मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगे और वह जवाब सीलबंद लिफाफे में जमा कराए.
पीड़िता के माता-पिता द्वारा दाखिल हलफनामा भी संवेदनशील मामले को देखते हुए सीलबंद लिफाफे में रखा जाएगा. मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को होगी, जब कोर्ट पुलिस की जवाबी रिपोर्ट देखेगा और यह फैसला लेगा कि जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जाए या नहीं.