ग्लोबल भारत नेशनल डेस्क: हाल ही में देश की संसद में पेश हुए वक्फ बिल कानून पर सियासी घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है. इस कानून के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में 150 से ज्यादा याचिकाएं दायर की गईं, जिसमें अधिकतर याचिकाएं राजनीति से प्रेरित लोगों के द्वारा ही दर्ज की गई हैं. और इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार को जवाब देने के लिए 7 दिन का समय दिया है. जबकि अगली सुनवाई 5 मई को निर्धारित की गई है. लेकिन आज हम आपको कुछ ऐसे मामले बताते हैं जब सुप्रीम कोर्ट ने संसद के फैसले को पलट दिया था.
Keshavananda Bharati Case (1973)
सुप्रीम कोर्ट ने "सर्वोच्च अधिकारों" का सिद्धांत लागू किया और संसद को संविधान में संशोधन करने के लिए सीमाएं निर्धारित कीं।
Minerva Mills Case (1980)
इस मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान संशोधन के खिलाफ फैसला दिया, जो आर्थिक स्वतंत्रता से संबंधित था और यह संसद द्वारा किए गए बदलाव को पलटने के समान था।
Indira Gandhi vs Raj Narain (1975)
सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को असंवैधानिक घोषित किया और संसद द्वारा पारित किए गए कुछ फैसलों को पलट दिया।
The Shah Bano Case (1985)
सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिला शाह बानो को गुजारा भत्ता देने के लिए आदेश दिया, जबकि संसद ने बाद में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार) कानून पास कर इस फैसले को पलट दिया।
The Golaknath Case (1967)
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संसद के संविधान संशोधन की शक्ति को सीमित किया, और इसे पलटने के लिए संविधान में बदलाव को अनिवार्य किया।
The Union Carbide Disaster Case (1989)
सुप्रीम कोर्ट ने यूनीयोन कार्बाइड के खिलाफ संसद द्वारा पारित कानूनों का पुनरावलोकन किया और उसे पलट दिया।
The NJAC Case (2015)
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) एक्ट को असंवैधानिक करार दिया।
The Anti-Defection Law (1992)
सुप्रीम कोर्ट ने संसद द्वारा बनाए गए अंटी-डिफेक्शन कानून की व्याख्या की और इसे पूरी तरह से लागू किया, जिससे संसद के फैसलों को एक नई दिशा मिली।
The Right to Privacy Case (2017)
सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को संविधान के मौलिक अधिकारों में शामिल किया, जबकि संसद ने इसे पहले नकारा था।
The National Judicial Appointments Commission (NJAC) Case (2015)
सुप्रीम कोर्ट ने संसद द्वारा पारित NJAC एक्ट को असंवैधानिक घोषित किया, जिससे न्यायपालिका के स्वतंत्र होने के सिद्धांत को मजबूत किया।