नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों से जुड़े उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज करने वाले अपने फैसले पर फिर से विचार किया. अदालत ने माना कि उस फैसले में बड़ी बेंच के दिए गए बाध्यकारी सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ. कोर्ट ने दोहराया कि बेल नियम है, जेल अपवाद का सिद्धांत UAPA जैसे कठोर कानूनों में भी लागू होता है. जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने स्पष्ट किया कि तीन जजों की बेंच द्वारा दिए गए के.ए. नजीब के फैसले को छोटी बेंचें न तो नजरअंदाज कर सकती हैं और न ही कमजोर.
छोटी बेंच बड़ी बेंच को ओवरराइड नहीं कर सकती
अदालत ने कहा कि कम सदस्यों वाली बेंच बड़ी बेंच के फैसलों से बंधी रहती है. अगर किसी फैसले पर संशय हो तो मामले को बड़ी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए. छोटी बेंच किसी बड़े फैसले को दरकिनार या कम महत्व नहीं दे सकती. के.ए. नजीब के फैसले में साफ किया गया था कि UAPA लागू होने के बावजूद, अगर मुकदमे में बहुत ज्यादा देरी हो रही हो और आरोपी लंबे समय से जेल में बंद हो, तो संवैधानिक अदालतें जमानत दे सकती हैं.
UAPA में भी लागू होता है बेल का सिद्धांत
कोर्ट ने कहा कि UAPA की धारा 43D(5) का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को अनिश्चित काल तक जेल में रखने के लिए नहीं किया जा सकता. अदालत ने चेतावनी दी कि अगर सिर्फ प्रथम दृष्टया आरोपों के आधार पर जमानत लगातार रोक दी जाती रही, तो ट्रायल शुरू होने से पहले की हिरासत सजा जैसी हो जाएगी. ट्विन प्रॉन्ग टेस्ट का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह परीक्षण न तो UAPA की धारा 43D(5) से सीधे निकलता है और न ही के.ए. नजीब फैसले से. लंबे समय तक जेल में रहने और मुकदमे में देरी की स्थिति में अदालतों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) को प्राथमिकता देनी चाहिए.
NCRB आंकड़ों का हवाला
जस्टिस उज्जल भुइयां ने इस फैसले में NCRB के आंकड़ों का उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि 2019 से 2023 तक UAPA मामलों में दोषसिद्धि की दर बेहद कम रही . न्यूनतम 1.5% से लेकर अधिकतम लगभग 4% तक. इसी क्रम में अदालत ने नार्को-टेरर मामले में पांच साल से जेल में बंद एक आरोपी को जमानत दे दी.