सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला देते हुए कहा है कि राज्यों के पास खदानों और खनिज युक्त भूमि पर कर लगाने का अधिकार है और रॉयल्टी कर नहीं है. सुप्रीम कोर्ट की 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गुरुवार को कहा कि राज्यों के पास खदानों और खनिज युक्त भूमि पर कर लगाने का संवैधानिक अधिकार है. फैसले में यह भी कहा गया कि निकाले गए खनिजों पर देय रॉयल्टी कर नहीं है. सीजेआई चंद्रचूड़ ने 7 अन्य न्यायाधीशों के साथ बहुमत का फैसला सुनाया, जबकि न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने असहमति जताई.
फैसले में कहा गया है कि रॉयल्टी कोई कर नहीं है. रॉयल्टी एक संविदात्मक प्रतिफल है, जो खनन पट्टेदार द्वारा खनिज अधिकारों के उपभोग के लिए पट्टादाता को दिया जाता है. रॉयल्टी का भुगतान करने की देयता खनन पट्टे की संविदात्मक शर्तों से उत्पन्न होती है. सरकार को किए गए भुगतान को केवल इसलिए कर नहीं माना जा सकता है, क्योंकि कानून में बकाया के रूप में उनकी वसूली का प्रावधान है.
कहा गया है कि खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति राज्य विधानसभाओं में निहित है और संसद के पास सूची 1 की प्रविष्टि 54 के तहत खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता नहीं है, क्योंकि यह एक सामान्य प्रविष्टि है. चूंकि खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति सूची 2 की प्रविष्टि 50 में उल्लिखित है, इसलिए संसद उस विषय वस्तु के संबंध में अपनी अवशिष्ट शक्ति का उपयोग नहीं कर सकती है.
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने बहुमत के फैसले से असहमति जताते हुए कहा कि रॉयल्टी एक कर की प्रकृति की है. इसलिए, रॉयल्टी लगाने के संबंध में केंद्रीय कानून-खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम 1957 (एमएमडीआर अधिनियम) के प्रावधान राज्यों को खनिजों पर कर लगाने की उनकी शक्ति से वंचित करते हैं. अल्पमत के फैसले में कहा गया है कि राज्यों को खनिजों पर कर लगाने की अनुमति देने से राष्ट्रीय संसाधन पर एकरूपता की कमी होगी.
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि इससे राज्यों के बीच अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी हो सकती है और इसके परिणामस्वरूप संघीय व्यवस्था टूट सकती है. फैसला सुनाए जाने के बाद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार और अभिषेक मनु सिंघवी ने पीठ से यह स्पष्ट करने का अनुरोध किया कि यह फैसला केवल भावी रूप से लागू होगा.
पीठ ने कहा कि वह अगले बुधवार को इस बिंदु पर पक्षों की सुनवाई करेगी. मामले में यह मुद्दा शामिल था कि क्या खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम (खान अधिनियम), 1957 के अधिनियमन के मद्देनजर राज्य सरकारों को खानों और खनिजों से संबंधित गतिविधियों पर कर लगाने और विनियमित करने की शक्तियों से वंचित किया गया है.