नई दिल्ली: त्योहारों और छुट्टियों के पीक सीजन में प्राइवेट एयरलाइंस द्वारा हवाई किराए में की जाने वाली बेतहाशा बढ़ोतरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने एयरलाइंस की मनमानी और अनियंत्रित किराए पर गंभीर नाराजगी जताते हुए सख्त टिप्पणी की है कि यदि एयरलाइंस तय नियमों का पालन नहीं करती हैं और यात्रियों का शोषण जारी रखती हैं, तो उनकी उड़ानों को रोकने (फ्लाइट्स सस्पेंड करने) जैसे कड़े कदमों पर भी विचार किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यात्रियों को मनमाने हवाई किराए से राहत मिलना बेहद जरूरी है।
त्योहारों और छुट्टियों में किराए में भारी उछाल पर नाराजगी जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ सामाजिक कार्यकर्ता और नियमित हवाई यात्री एस. लक्ष्मीनारायणन की जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि देश में प्राइवेट एयरलाइंस त्योहारों, छुट्टियों और आपातकालीन परिस्थितियों में टिकटों के दाम 300 से 400 प्रतिशत तक बढ़ा देती हैं। इसके अलावा विभिन्न सहायक शुल्क (Ancillary Charges) के नाम पर भी यात्रियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डाला जाता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि एक ही दिन और एक ही सेक्टर (रूट) के लिए अलग-अलग एयरलाइंस के किराए में जमीन-आसमान का फर्क देखने को मिलता है। एक ही इकोनॉमी क्लास की सीट के लिए जहां एक एयरलाइन ₹8,000 चार्ज करती है, वहीं दूसरी ₹18,000 तक वसूलती है। पीठ ने कहा कि यह असंतुलन पूरी तरह अनुचित है और इसमें तुरंत युक्तिसंगत सुधार (Rationalisation) की जरूरत है।
केंद्र ने नए नियमों के लिए मांगा तीन हफ्ते का समय केंद्र सरकार और नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को अवगत कराया कि नया 'भारतीय वायुयान अधिनियम' लागू हो चुका है और उसके तहत नए व्यापक नियमों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया जारी है। सरकार ने नए नियमों को अंतिम रूप देने और हितधारकों से विचार-विमर्श पूरा करने के लिए तीन हफ्ते का समय मांगा।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि नियमों के अभाव के बजाय मौजूदा नियमों का कड़ाई से पालन न होना मुख्य समस्या है। उन्होंने कहा कि डीजीसीए के पास अत्यधिक किराया वसूलने वाली एयरलाइंस को निर्देश जारी करने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसका प्रभावी इस्तेमाल नहीं हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि वह उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए जल्द से जल्द ठोस और पारदर्शी नियामक ढांचा तैयार करे।