नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में जारी किए गए उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले नियम 2026 को लेकर देशभर में तीखी बहस छिड़ी हुई है. ये नियम मुख्य रूप से उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से बनाए गए हैं, लेकिन इनमें कुछ प्रावधानों को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों में भारी असंतोष है.
सुप्रीम कोर्ट में अब इस मामले पर कई याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ आज (29 जनवरी 2026) इन याचिकाओं पर सुनवाई करने वाली है. याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा केवल एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों तक सीमित है, जिससे सामान्य वर्ग के लोग शिकायत निवारण तंत्र से वंचित रह जाते हैं. वे इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन बताते हैं और मांग कर रहे हैं कि भेदभाव की परिभाषा जाति-तटस्थ (caste-neutral) बनाई जाए.
सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि ये नियम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में लागू किए जा रहे हैं और किसी भी वर्ग, समुदाय या व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा. केंद्र ने कहा है कि वह संवैधानिक ढांचे के भीतर ही सभी चिंताओं का समाधान करेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार फिलहाल जल्दबाजी में कोई बड़ा बदलाव नहीं करेगी, बल्कि कोर्ट की सुनवाई और दिशा-निर्देशों का इंतजार करेगी. उसके बाद ही नियमों में संशोधन या अन्य कदम उठाए जा सकते हैं.
सरकार के पास क्या-क्या विकल्प?
उधर बीएसपी प्रमुख मायावती ने इन नियमों का समर्थन करते हुए कहा है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए समानता समितियां बनाना जरूरी है. उन्होंने एक्स पर पोस्ट में लिखा कि इन प्रावधानों का विरोध मुख्य रूप से सामान्य वर्ग के कुछ लोगों द्वारा किया जा रहा है, जिनमें जातिवादी सोच है. इसे भेदभाव या साजिश बताना गलत है. हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ऐसे नियम लागू करने से पहले सभी को साथ लेकर चलना चाहिए था, ताकि सामाजिक तनाव न बढ़े. सरकारों और संस्थानों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए. कुल मिलाकर, विवाद अभी चरम पर है और सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के नतीजे से ही आगे की दिशा तय होगी.