ऋषिकेश/नई दिल्ली: लद्दाख के कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के जंतर-मंतर पर चल रहे अनशन के बीच सोशल मीडिया पर एक बार फिर प्रोफेसर जीडी अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) की यादें ताजा हो रही हैं. गंगा संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले इस IIT प्रोफेसर ने 111 दिनों के आमरण अनशन के बाद 2018 में प्राण त्याग दिए थे.
प्रोफेसर जीडी अग्रवाल उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में जन्मे. उन्होंने रुड़की यूनिवर्सिटी (अब IIT रुड़की) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बाद में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले से पर्यावरण इंजीनियरिंग में पीएचडी हासिल की. वे IIT कानपुर में प्रोफेसर रहे और देश के पहले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के सदस्य सचिव भी बने.
2011 में गंगा दशहरा के दिन उन्होंने संन्यास ले लिया और स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद नाम अपनाया. इसके बाद उनका पूरा जीवन गंगा को अविरल और निर्मल बनाने में समर्पित हो गया. 2008 में पहली बार गंगा संरक्षण के लिए अनशन किया. 2010 में लोहारी नागपाला जलविद्युत परियोजना के खिलाफ 38 दिन का अनशन किया, जिसके बाद सरकार को परियोजना रोकनी पड़ी.
22 जून 2018 से आमरण अनशन शुरू किया. मुख्य मांगें थीं, गंगा सुरक्षा अधिनियम, जलविद्युत परियोजनाओं पर रोक, बालू खनन बंद और स्वतंत्र गंगा परिषद का गठन. अनशन के दौरान उन्होंने पानी भी पीना बंद कर दिया. 11 अक्टूबर 2018 को ऋषिकेश के एम्स में उनका निधन हो गया. उनकी मौत ने पूरे देश में गंगा संरक्षण को लेकर नई बहस छेड़ दी थी. सोनम वांगचुक के अनशन के बीच लोग जीडी अग्रवाल के बलिदान को याद कर रहे हैं.
कई लोग कह रहे हैं कि पर्यावरण और नदियों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आध्यात्मिक समर्पण का यह अनुपम उदाहरण आज भी प्रेरणा स्रोत बना हुआ है. जीडी अग्रवाल का संघर्ष आज भी उन सभी कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा है जो पर्यावरण संरक्षण के लिए अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार हैं.