ट्रंप की मतलब वाली दोस्ती से दूर हटेगा भारत! गिरगिट की तरह बदलते हैं रंग, अब मोदी को नहीं रहा भरोसा, बड़ा झटका देने की तैयारी !

Abhishek Chaturvedi 16 May 2025 03:11: PM 3 Mins
ट्रंप की मतलब वाली दोस्ती से दूर हटेगा भारत! गिरगिट की तरह बदलते हैं रंग, अब मोदी को नहीं रहा भरोसा, बड़ा झटका देने की तैयारी !

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नई दिल्ली: ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद भी कुछ लोग मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठा रहे हैं, वो पूछ रहे हैं जैसे चीन ने कहा हम पाकिस्तान की संप्रभुता के साथ हैं, वैसा बयान भारत को लेकर कितने देशों ने दिया, इजरायल जैसे देश ने सिर्फ आतंकवाद के नाम पर कार्रवाई की तारीफ की, रूस जैसे मित्र देश ने भी खुलकर संप्रभुता के मसले पर कुछ नहीं कहा, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला कहते हैं जो डर था वही हुआ, पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को एक बार फिर इंटरनेशनल मुद्दा बनाने में लगता है सफल हो गया!

तो अब सवाल उठता है क्या मोदी सरकार की विदेश नीति इस मामले में नाकाम रही है, क्योंकि संकट के वक्त यही देखा जाता है कि कौन आपके साथ है और कौन आपके खिलाफ, तटस्थ होने का कोई मतलब नहीं होता, जिस अमेरिका से भारत को बड़ी उम्मीद थी, उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो मोदी के दोस्त भी हैं, जिनके लिए ट्रंप हाउडी मोदी कार्यक्रम करवाते हैं वो संकट के वक्त भारत को ऐसे धोखा देते हैं, जैसे मोदी से उनकी दोस्ती ही नहीं हो. ऐसे में हर हिंदुस्तानी ये पूछ रहा है कि क्या भारत अमेरिका को भी कोई बड़ा झटका दे सकता है, क्योंकि अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान दोनों को एक ही तराजू में तौलने की कोशिश की है, तो इसे समझने के लिए इतिहास के पन्नों में चलना होगा.

पंडित नेहरू के दौर में भारत की विदेश नीति ये कहती थी कि हम किसी गुट का हिस्सा नहीं होगे, यानि गुटनिरपेक्ष होंगे.

जबकि मोदी सरकार की नीति कहती है हम हर गुट का हिस्सा होंगे, उस क्वाड का भी हिस्सा होंगे, जिससे चीन चिढ़ता है, उस ब्रिक्स में भी होंगे जिसमें चीन है.

यानि नॉन अलाइमेंट ग्रुप की नीति जो नेहरू की थी, उसे छोड़कर भारत मल्टी अलाइनमेंट की नीति पर है, इस शब्द का इस्तेमाल 2013 में पहली बार थरूर ने किया था

थरूर ने तभी कहा था कि अब कोई भी देश गुटनिरपेक्ष होकर आगे नहीं बढ़ सकता, सबको सबकी जरूरत है, इसीलिए मोदी सरकार की विदेश नीति से वो ज्यादातर मौके पर सहमत भी होते हैं, यहां तक कि विदेश मामलों के कई जानकार ये भी कहते हैं पाकिस्तान चूंकि चीन का पिछलग्गु देश है, इसलिए वो इस तरीके के बयान दे रहा है, जबकि भारत आत्मनिर्भर, संप्रभु और खुद की रक्षा कैसे करते हैं, ये समझने वाला देश है, ये दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि कौन हमारे साथ है और कौन खिलाफ, वो वही करेगा, जो देशहित में होगा. पर अमेरिका को ये रास नहीं आता, इसलिए वो हर किसी के मसले में टांग अड़ाता है. नतीजा भारत ने जब ऑपरेशन सिंदूर चलाया और पाकिस्तान दौड़ा-दौड़ा अमेरिका के पास गया तो ट्रंप ने सरपंच बनने की कोशिश की, और भारत को तीन बड़े झटके दिए.

पहला- सबसे पहले ट्विटर पर ये ऐलान किया कि दोनों देश युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं, जिस पर पूरा विपक्ष अभी भी सवाल पूछ रहा है कि ट्रंप ने ऐलान क्यों किया ?

दूसरा- कश्मीर मुद्दे में मध्यस्थता की बात कर ये संदेश दिया कि धारा 370 हटने के बाद भी कश्मीर का जिन्न खत्म नहीं हुआ, जिससे पूरा हिंदुस्तान खफा है

तीसरा- मोदी से दोस्ती होने के बावजूद पहले भारत पर टैरिफ लगाया, और अब ऐपल कंपनी के मालिक को ये कहा कि भारत में आप बिल्डिंग मत बनाइए

जिसके बाद आईफोन बनाने वाली इस कंपनी ने हिंदुस्तान में लॉन्च होने वाले बड़े प्रोजेक्ट को रोक दिया  है, अगर यहां आईफोन का प्रोजेक्ट लगता तो जाहिर सी बात है रोजगार पैदा होते, देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती, लेकिन ट्रंप ने ऐसा नहीं होने दिया, तो क्या डोनाल्ड ट्रंप दोस्ती के काबिल नहीं हैं, वो सिर्फ बिजनेस सोचते हैं, इसीलिए सीरिया में जाकर उस व्यक्ति से हाथ मिला लिया, जिस पर अमेरिका ने ही 85 करोड़ का इनाम रखा था, तो क्या भारत को भी अमेरिका कोई झटका देना चाहिए. आंकड़े बताते हैं

भारत के साथ अमेरिका का व्यापार करीब 140 अरब डॉलर का है, जबकि पाकिस्तान के साथ 10 अरब डॉलर का है, तो क्या भारत इसे कम कर सकता है?

अमेरिका में करीब 54 लाख अप्रवासी भारतीय रहते हैं, जिनके पास वहां रहने के पूरे दस्तावेज हैं, वो काम करके अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर रहे हैं.

उन्होंने देशभक्ति के नाते अगर वापस लौटने का फैसला ले लिया, तो अमेरिका में क्या उथल-पुथल नहीं मचेगी, और क्या ये फैसला वहां बैठे लोगों को लेना होगा, ताकि ट्रंप को भारत की अहमियत पता चले.

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