उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा...

Amanat Ansari 05 Jan 2026 01:27: PM 2 Mins
उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा...

नई दिल्ली: 2020 दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि मुकदमे में लंबी देरी जमानत का आधार नहीं बन सकती. कोर्ट ने सह-आरोपी शरजील इमाम को भी जमानत देने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि जमानत देना आरोपों को कमजोर करने का मतलब नहीं है.

जस्टिस अरविंद कुमार और एनवी अंजारिया की बेंच ने कहा, "यह कोर्ट संतुष्ट है कि अभियोजन पक्ष के सामग्री में अपीलकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ प्रथम दृष्टया आरोप प्रकट होते हैं. इन अपीलकर्ताओं के संबंध में वैधानिक सीमा लागू होती है. कार्यवाही के इस चरण में उन्हें जमानत पर रिहा करना उचित नहीं है."

हालांकि अन्य आरोपियों, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, मोहम्मद सलीम खान, शादाब अहमद और शिफा उर रहमान को जमानत देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला उनके खिलाफ आरोपों को कमजोर नहीं करता. वे लगभग 12 शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा होंगे. कोर्ट ने कहा, "इनमें से किसी भी शर्त का उल्लंघन होने पर ट्रायल कोर्ट आरोपी को सुनवाई का मौका देकर जमानत रद्द कर सकता है."

अपने आदेश में कोर्ट ने तथ्यात्मक पृष्ठभूमि और अभियोजन की कहानी पर विचार किया तथा लंबी कैद, गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) की व्याप्ति और अन्य संबंधित पहलुओं पर विचार किया. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने संविधान और कानून की अमूर्त तुलना नहीं की है. बल्कि सटीक सवाल यह है कि यूएपीए के तहत जमानत आवेदनों की जांच कैसे की जानी चाहिए जब मुकदमे में देरी का तर्क दिया जाता है.

कोर्ट ने पुष्टि की कि संविधान के तहत तेज मुकदमे का अधिकार मान्यता प्राप्त है. कोर्ट ने कहा, "मात्र मुकदमे में देरी को सजा नहीं माना जा सकता, और स्वतंत्रता से वंचित करना मनमाना नहीं होना चाहिए." प्री-ट्रायल चरण में जमानत पर विचार करते समय, राष्ट्रीय सुरक्षा के आरोप वाले मामलों में देरी "ट्रंप कार्ड" की तरह काम नहीं कर सकती, लेकिन यह बढ़ी हुई न्यायिक जांच को ट्रिगर कर सकती है.

कोर्ट ने आगे जोर दिया कि जमानत पर विचार करते समय यूएपीए के तहत कथित साजिश या गतिविधि के संदर्भ में प्रत्येक आरोपी की भूमिका की जांच की जानी चाहिए. नतीजतन, राज्य की नींव को खतरे में डालने वाले मामलों में स्वतंत्रता के सामान्य मूल्यांकन अलग होते हैं, जिसमें यूएपीए के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत प्रत्येक आरोपी की भूमिका का सावधानीपूर्वक न्यायिक मूल्यांकन आवश्यक है.

उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं कि उन्होंने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की साजिश रची, जिसमें 53 लोग मारे गए और 700 से अधिक घायल हुए.

यह हिंसा नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ प्रदर्शनों के बीच हुई थी.
आरोपियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2 सितंबर के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी जिसमें दंगों से जुड़े बड़ी साजिश मामले में उन्हें जमानत देने से इनकार किया गया था.

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