प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को फोन करते हैं, फोन पर क्या बातचीत होती है इससे ज्यादा अहम ये जानना है आखिर फोन करते क्यों हैं. मोदी ट्वीट कर खुद बताते हैं पश्चिम एशिया में बने हालात को लेकर बात हुई. ऐसे में ये समझना जरूरी हो जाता है कि क्या दुनिया पर कोई बड़ा खतरा मंडरा रहा है. क्योंकि पश्चिम एशिया में आने वाला देश इजरायल फिलहाल लेबनान के साथ किस कदर उलझा है. दुनिया देख रही है, ईरान अगर पलटवार करेगा तो अमेरिका तक गूंज पहुंचेगी, लेकिन इससे भारत पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा, फिर मोदी दुनियाभर के नेताओं को फोन कर क्यों समझा रहे हैं. तो इसकी कहानी जुड़ी है श्रीमद्भागवद्गीता से, जिसमें श्रीकृष्ण कहते हैं व्यक्ति को अपने क्रोध पर काबू रखना चाहिए, क्रोध में आकर गलत फैसला नहीं लेना चाहिए, वरना भविष्य में खुद को भी और आसपास के लोगों को भी वो संकट में डालता है.
मोदी भी यही बात समझाने की कोशिश दुनिया के तीन देशों को कर रहे हैं. जिसमें पहले नंबर पर है रूस, जहां के राष्ट्रपति पुतिन को खुद फोन कर समझाते हैं. मिलकर कहते हैं शांति का मार्ग अपनाओ, फिर अपना दूत यानि डोभाल को भेजकर कहते हैं शांति जरूरी है. दूसरे नंबर पर है यूक्रेन, जहां खुद जाकर कहते हैं, हम बुद्ध की धरती के लोग हैं और हम हमेशा शांति की ही बात करेंगे. जबकि तीसरे नंबर पर है, इजरायल, जहां के पीएम को फोन कर मोदी कहते हैं...पश्चिम एशिया में जो हो रहा है, वो चिंताजनक है. हमारी दुनिया में आतंकवाद के लिए कोई जगह नहीं है. इलाके में तनाव को रोकने और सभी बंधकों की सुरक्षित रिहाई सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है. भारत शांति और स्थिरता की जल्द से जल्द बहाली की कोशिश का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है.
अब यहां समझने वाली बात ये है कि न तो हमारी सीमाएं इजरायल से लगती हैं, न लेबनान से लगती हैं, यहां तक कि रूस और यूक्रेन भी हमसे काफी दूर हैं, फिर मोदी शांति की वकालत क्यों कर रहे हैं, तो इसकी पहली वजह है वसुधैव कुटुम्बकम की नीति कि हम पूरी दुनिया को परिवार मानते हैं, जबकि दूसरी वजह है इंसानियत और तीसरी वजह है अपना हित. अब भारत का इसमें कौन सा हित है, ये भी समझ लीजिए.
पहला हित दोस्ती का- भारत और इजरायल कितने अच्छे दोस्त हैं, दुनिया जानती है, दोस्त का धर्म होता है कि वो समझा-बुझाकर उसे शांति के रास्ते पर चलने को प्रेरित करे, यही काम मोदी कर रहे हैं.
दूसरा हित वैश्विक बिजनेस का- भारत कच्चा तेल और भारी मात्रा में विदेशी सामान अपने यहां मंगवाता है. अब इजरायल और लेबनान के बीच की कहानी आगे बढ़ी तो खाड़ी मुल्क ईरान भी इसमें सीधे तौर पर कूदेगा, ईरान के कूदने का मतलब है, दूसरे मुल्क भी साथ आ सकते हैं, फिर भारत का ही नहीं दुनियाभर का बिजनेस प्रभावित होगा. कोरोना से टूट चुकी कई देशों की अर्थव्यस्था और गर्त में जा सकती है.
तीसरा हित है निवेश का- भारत ने खाड़ी मुल्कों में काफी मात्रा में बीते 10 सालों में निवेश किया है, वहां के निवेशक भी हमारे यहां आए हैं, अब अगर सब संकट में फंसेंगे तो इससे बिजनेस, नौकरियां औऱ तमाम चीजें प्रभावित होंगी.
ये वो सामान्य बातें हैं, जिसे मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर न सिर्फ सोचते हैं, बल्कि ये चीजें प्रभावित न हो, इसका बखूबी ख्याल भी रखते हैं. और फिलहाल इस बिगड़े हालात को सिर्फ भारत ही संभाल सकता है, क्योंकि नेतन्याहू न तो अमेरिका की सुन रहे हैं, न ब्रिटेन की. यहां तक कि पुतिन भी किसी की नहीं सुन रहे हैं, अगर वो सीधे मुंह बात भी कर रहे हैं तो वो भी सिर्फ भारत से, क्योंकि भारत से उनके न सिर्फ रिश्ते अच्छे हैं, बल्कि भारत दुनिया की बढ़ती अर्थव्यवस्था तो है ही, साथ ही वो अपने फायदे के लिए अमेरिका की तरह किसी की नुकसान नहीं चाहता. यही वजह है कि एक तरफ भारत से अलग हुआ पाकिस्तान हर तरफ घूमककर कर्जा मांग रहा है, तो दूसरी तऱफ भारत दुनिया को शांति के रास्ते पर चलने की सीख दे रहा है.