लोकसभा चुनाव 2024 चल रहा है. मोदी की अगुवाई में बीजेपी मिशन 400 का लक्ष्य हासिल करने का सपना देख रही है. लेकिन हर कोई जानता है कि बिना यूपी के दिल्ली की गद्दी का रास्ता साफ़ ही ही नहीं सकता. लिहाज़ा इस राज्य की 80 लोकसभा सीटों पर जी जान लगा देना, भाजपा की जरूरत भी है और मजबूरी भी. इसलिए पार्टी यूपी पर पूरा फोकस कर रही है लेकिन सिर्फ यूपी ही नहीं दूसरे राज्यों की भी कुछ सीटें हैं जिसने बीजेपी की नींद उड़ा कर रख दी है.
वैसे तो देशभर में लगभग 160 सीटें हैं जो बीजेपी के लिए चुनौती बनी हुई हैं. दरअसल साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी अलग-अलग राज्यों की इन 160 सीटों में से ज्यादातर सीटें हार गई थी. हालांकि इस सूची में कुछ ऐसी लोकसभा सीटें भी शामिल हैं, जिस पर भाजपा ने ही जीत दर्ज की थी. लेकिन जीत का अंतर बहुत कम था. ऐसे में पार्टी का मानना है कि ये सीटें स्थानीय सामाजिक और राजनीतिक कारकों के कारण चुनौती बनी हुई हैं. इन सीटों में खासकर हरियाणा की रोहतक और उत्तर प्रदेश की बागपत जैसी सीटें शामिल हैं.
इस बात में कोई दोराय नहीं है कि बीजेपी जी तोड़ मेहनत कर रही है. बावजूद इसके देश में कई ऐसी सीटें हैं जो बीजेपी के विजयरथ की राह में कांटे बो सकती हैं. जिनमे सबसे ज्यादा सीटें देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश से आती हैं. लेकिन आज हम चर्चा करेंगे पांच सीटों की जिन्हें अगर बीजेपी हारी तो पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा की कुर्सी जा सकती है. शुरुआत करते हैं देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की. सबसे पहले बात करते हैं पश्चिमी यूपी की फिरोजाबाद संसदीय सीट की, जहां इस बार BJP को जीत के लिए खून-पसीना एक करना पड़ सकता है. 2019 में यहां बीजेपी के चंद्रसेन जौदान ने जीत दर्ज की थी. दूसरे नंबर पर थे सपा प्रमुख अखिलेश यादव के चचेरे भाई अक्षय यादव. हार जीत का अंतर 28 हज़ार 781 वोटों का था. आप कहेंगे ये तो ठीक-ठाक अंतर है. मगर ठहरिए तो, कहानी में ट्विस्ट है. उस चुनाव में चाचा शिवपाल यादव भी फिरोजाबाद से ताल ठोक रहे थे. उनके खाते में 91869 वोट भी आए थे. अबकी बार चाचा-भतीजा एक साथ हैं और यही बीजेपी के लिए मुश्किल वाली बात है. क्योंकि फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर वापसी के लिए सपा की छटपटाहट ने भगवा खेमे की जद्दोजद बढ़ा दी है. यही वजह है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अभी तक फिरोजाबाद सीट पर प्रत्याशी तय नहीं कर पाया है.
वेस्ट यूपी के सबसे बड़े शहरों में से एक मेरठ में भी भाजपा की राह आसान नहीं थी. मेरठ संसदीय सीट पर बीजेपी के राजेंद्र अग्रवाल को बीएसपीके हाजी याक़ूब पर महज़ 4 हज़ार 729 वोटों से जीत मिल सकी थी. कुछ ऐसा ही हाल मेरठ से सटे मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट का भी था. जहां बीजेपी के संजीव बालियान ने RLD उम्मीदवार को सिर्फ 6526 वोटों से हराया था. लेकिन इस बार यहां की सियासत अलग ही कहानी बयां कर रही है. मेरठ में जाति का समीकरण बीजेपी के पक्ष में नहीं दिख रहा है लेकिन हिंदुत्ववादी राजनीति के दम पर बीजेपी ये सीट निकालना चाहती है. मेरठ लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी ने जनरल सीट पर दलित वर्ग से आने वाली सुनीता वर्मा को टिकट दिया है और बहुजन समाज पार्टी ने अगड़ी समुदाय से आने वाले देवव्रत त्यागी को चुनावी मैदान में उतारा है. कहने को तो लोकसभा चुनाव के मैदान में तीनों ही खिलाड़ी नए हैं. लेकिन अरुण गोविल मेरठ के जातीय समीकरण के जंजाल में फंसते नजर आ रहे हैं. सपा-बसपा का जातीय समीकरण बीजेपी की राह में चुनौतियां बन रहा है.
इसी तरह रायपुर लोकसभा सीट पर भी पेंच फंसा हुआ है. वैसे तो इस सीट का इतिहास काफी दिलचस्प रहा है. प्रदेश के राजनीतिक सफर पर गौर करें तो बीते 20 वर्षों से यहां भाजपा का कब्जा रहा है. कांग्रेस को यहां अपनी जमीन तलाशने के लिए जी-तोड़ मेहनत करनी पड़ रही है, वहीं भाजपा के पास सीट बरकरार रखने की चुनौती है. रायपुर लोकसभा सीट की नौ विधानसभा सीटों में प्रचार शुरू हो चुका है. 2024 के इस मुकाबले में भाजपा प्रत्याशी बृजमोहन अग्रवाल और कांग्रेस प्रत्याशी विकास उपाध्याय आमने-सामने हैं. राष्ट्रीय मुद्दों के बीच स्थानीय मुद्दे चुनाव में जनता की आवाज बने हुए हैं. गांव-शहरों की अपनी मांगें हैं. पक्की चौड़ी सड़क, नाली, तालाबों की साफ-सफाई, सौंदर्यीकरण के साथ-साथ भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन व बेहतर कानून व्यवस्था पर लोग प्रत्याशियों से बात कर रहे हैं. साथ ही भाजपा केंद्र सरकार की उपलब्धियां गिना रही है, वहीं कांग्रेस सत्ता की कमजोरी सामने रख रही है.
इसी तरह राजस्थान की सीकर-झुंझुनूं सीट ने भी बीजेपी की चिंता बढ़ा दी है. नतीजा पार्टी ने सांसद घनश्याम तिवाड़ी को इस सीट पर चुनाव प्रचार का जिम्मा दिया हुआ है. सीकर में कांग्रेस-सीपीएम गठबंधन के कारण और झुंझुनूं में कांग्रेस के प्रभावशाली उम्मीदवार बृजेंद्र ओला के कारण भाजपा के लिए ये सीटें चुनौती बनी हुई हैं.
राजस्थान की एक और सीट नागौर में भी बीजेपी को पेंच फंसा हुआ नज़र आ रहा है. इस सीट पर कांग्रेस-आरएलपी गठबंधन के कारण पार्टी को अच्छी खासी टक्कर मिल सकती है. यहां ज्योति मिर्धा और आरएलपी सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल के बीच कड़ा मुकाबला है.