नई दिल्ली: प्रसिद्ध UPSC कोचिंग गुरु अवध ओझा ने आखिरकार राजनीति को अलविदा कह दिया. दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में पटपड़गंज से आम आदमी पार्टी के टिकट पर लड़ने और हार जाने के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने न सिर्फ पार्टी से इस्तीफा दे दिया, बल्कि पूरी राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी.
ओझा ने सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट लिखी, “अरविंद केजरीवाल जी महान नेता हैं. मनीष सिसोदिया जी, संजय सिंह जी और सभी कार्यकर्ताओं को दिल से धन्यवाद. जो सम्मान और प्यार दिया, उसका हमेशा ऋणी रहूंगा. राजनीति से संन्यास मेरा निजी फ़ैसला है. जय हिंद!” इस घोषणा के बाद AAP में ख़ासा बवाल मच गया.
पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सोमनाथ भारती ने ओझा पर तीखा हमला बोला. उन्होंने X पर लिखा, “व्यक्तिगत रूप से आपका सम्मान करता हूं, लेकिन राजनीति कोई शॉर्ट-टर्म प्रोजेक्ट नहीं है. आपके जैसे परिपक्व व्यक्ति को पार्टी जॉइन करने से पहले सोचना चाहिए था. पटपड़गंज में कई मेहनती कार्यकर्ता थे, फिर भी पार्टी ने आपको मौक़ा दिया – इस भरोसे पर कि आप हार-जीत से ऊपर उठकर साथ रहेंगे. यह निर्णय पार्टी के लिए निराशाजनक है.”
दरअसल, संन्यास की असली वजह कुछ और बताई जा रही है. हाल ही में अवध ओझा की समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव से करीब तीन घंटे लंबी मुलाकात हुई थी. एक पॉडकास्ट में खुद ओझा ने खुलासा किया कि यह मुलाकात सिर्फ और सिर्फ शिक्षा सुधार पर केंद्रित थी. उन्होंने अखिलेश को एक चिट्ठी भी दी, जिसमें लिखा था, “भैया, हमें न MP बनना है, न MLA, न मंत्री. बस शिक्षा में क्रांति चाहिए.”
ओझा ने कहा कि अखिलेश के साथ शिक्षा, इतिहास, भूगोल और राजनीति शास्त्र पर इतनी गहरी बातचीत हुई जो सालों बाद किसी नेता के साथ हो पाई. उन्होंने साफ कहा कि उनका मकसद कभी कुर्सी नहीं था, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को बदलना था और इसके लिए उन्हें लगा कि सत्ता में उनका कोई “अपना आदमी” होना चाहिए जो उनकी बात सुन सके.
दिसंबर 2024 में धूमधाम से AAP जॉइन करने वाले अवध ओझा ने फरवरी 2025 के चुनाव में हार के बाद महसूस किया कि पार्टी के भीतर खुलकर शिक्षा के मुद्दे पर बोलना मुश्किल हो रहा है. यही वजह बनी कि उन्होंने पहले इस्तीफ़ा दिया और अब पूरी राजनीति से किनारा कर लिया.
अब सवाल यह है कि क्या अखिलेश यादव के साथ उनकी गहरी मुलाकात और शिक्षा पर बनी सहमति के बाद अवध ओझा भविष्य में सपा के किसी बड़े शिक्षा मिशन का हिस्सा बनेंगे? या फिर वे पूरी तरह कोचिंग और मोटिवेशन की दुनिया में वापस लौट जाएंगे? फिलहाल ओझा की राजनीतिक पारी महज़ 9 महीने में ही खत्म हो गई.